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📌 मामला क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज के लिए बहू को प्रताड़ित करने के 24 साल पुराने केस में आरोपी सास को बरी कर दिया है।

  • इससे पहले ट्रायल कोर्ट और उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महिला को आईपीसी धारा 498ए के तहत दोषी ठहराकर 3 साल की सजा सुनाई थी।

  • शुक्रवार को जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए महिला को बरी कर दिया।


🕑 पृष्ठभूमि: 2001 में हुई थी शिकायत

  • जून 2001 में मृतका के पिता ने शिकायत दर्ज कराई थी।

  • उनका आरोप था कि बेटी की ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, जबकि वह गर्भवती थी।

  • पिता ने कहा था कि बेटी अक्सर मायके आकर बताती थी कि उसकी सास दहेज के लिए उसे ताने मारती थी।

  • मृतका के सास, ससुर और देवर पर केस दर्ज हुआ।

  • निचली अदालत ने ससुर और देवर को बरी किया, लेकिन सास को दोषी मानते हुए सजा दी।

  • हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था।

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⚖️ सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “ससुराल वालों द्वारा बहू को दहेज के लिए प्रताड़ित करने की बातें हवा से भी तेज फैलती हैं।”

  • बेंच ने माना कि निचली अदालत और हाईकोर्ट ने गवाहों के बयान की गलत व्याख्या की।

  • कोर्ट ने कहा कि पड़ोसन की गवाही अहम थी, जिसने साफ कहा कि बहू से कभी दहेज की मांग नहीं हुई।

  • ऐसे में आरोपी सास को दोषी ठहराने का आधार कमजोर था।

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📜 आईपीसी की धारा 498A क्या कहती है?

  • धारा 498ए (IPC):
    👉 विवाहित महिला के प्रति पति या उसके ससुरालवालों द्वारा “क्रूरता” को अपराध मानती है।

  • इसमें शामिल है:

    • 💰 दहेज की मांग

    • 😡 मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न

    • 👩‍👩‍👧 विवाहित महिला या उसके रिश्तेदारों को अवैध मांग पूरी करने के लिए मजबूर करना

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👩 सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

  • सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी महिला की अपील स्वीकार की।

  • हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया।

  • आरोपी सास को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।


📢 महत्व क्यों है यह फैसला?

  • यह फैसला दिखाता है कि सिर्फ आशंकाओं या सुनी-सुनाई बातों के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।

  • कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज प्रताड़ना जैसे मामलों में साक्ष्यों और गवाहियों का संतुलित मूल्यांकन बेहद जरूरी है।

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By Editor