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लालकुआं/बिंदुखत्ता।

क्षेत्र में घरेलू गैस की किल्लत अब ‘किल्लत’ नहीं, बल्कि आम जनता के सब्र का इम्तिहान बन चुकी है। आलम यह है कि 25-25 दिनों की एडवांस बुकिंग के बावजूद उपभोक्ताओं के घर के चूल्हे ठंडे पड़े हैं। मंगलवार को लालकुआं शहर, बरेली रोड और बिंदुखत्ता के विस्तृत क्षेत्र में गैस वितरण पूरी तरह ठप रहने से हड़कंप मच गया। विडंबना देखिए कि एक ओर जनता सड़कों पर ‘त्राहि-माम’ कर रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं।

एजेंसी खाली, अधिकारी मौन और जनता बेहाल

​पिछले 15 दिनों से क्षेत्र में सिलेंडरों के लिए मारामारी मची है। जिला प्रशासन के दावों की हवा तब निकल गई जब ईद और रविवार के अवकाश के बाद मंगलवार को भी वितरण गाड़ियां क्षेत्र में नहीं पहुंचीं। सुरुचि इंडेन गैस एजेंसी के प्रबंधक जीवन सिंह का कहना है कि गोदाम में स्टॉक शून्य हो चुका है। काशीपुर प्लांट से आज शाम तक मात्र 360 सिलेंडरों की एक खेप आने की उम्मीद है, जबकि क्षेत्र की दैनिक मांग 600 सिलेंडरों से कहीं अधिक है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन ऊंट के मुंह में जीरे के समान इस आपूर्ति से हजारों उपभोक्ताओं की समस्या हल कर पाएगा?

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संपर्क से बाहर विधायक, जवाब देने से कतरा रहे अधिकारी

​जब जनता अपनी फरियाद लेकर क्षेत्रीय विधायक डॉ. मोहन बिष्ट से संपर्क करना चाहती है, तो उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है। वहीं, खाद्य आपूर्ति विभाग (DSO) के अधिकारी केवल ‘वार्ता चल रही है’ का रटा-रटाया जवाब देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। लालकुआं, 25 एकड़, इंदिरानगर और बिंदुखत्ता के उपभोक्ता लगातार पत्रकारों को फोन कर अपनी व्यथा सुना रहे हैं, लेकिन शासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।

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अग्रसर भारत का सवाल: कब सुधरेगा सिस्टम?

​उपभोक्ताओं में अब भारी आक्रोश और आने वाले दिनों को लेकर असुरक्षा की भावना घर कर रही है। 25 दिन पहले बुकिंग कराने के बाद भी अगर सिलेंडर के लिए लाठियां खानी पड़ें या खाली हाथ लौटना पड़े, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता है।

‘अग्रसर भारत’ प्रशासन से मांग करता है कि:

  1. ​गैस की आपूर्ति युद्धस्तर पर बहाल की जाए।
  2. ​बुकिंग के आधार पर पारदर्शिता के साथ वितरण सुनिश्चित हो।
  3. ​जनप्रतिनिधि और अधिकारी जनता के प्रति अपनी जवाबदेही तय करें।
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​यदि जल्द ही स्थिति सामान्य नहीं हुई, तो आक्रोशित जनता सड़कों पर उतरने को मजबूर होगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और संबंधित गैस कंपनी की होगी।

“पत्रकारों को देखते ही उमड़ा जनता का दर्द: कवरेज करने पहुंचे वरिष्ठ पत्रकार को घेरकर उपभोक्ताओं ने रुआंसे स्वर में बस यही गुहार लगाई— ‘साहब! खबर तो छापते रहिएगा, पहले बस एक गाड़ी गैस की तो मंगवा दीजिए।'”

​यह लाइन जनता की हताशा और पत्रकारों पर उनके भरोसे को बहुत ही मार्मिक ढंग से पेश करती है।

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