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अल्मोड़ा/उत्तराखंड 

​अल्मोड़ा में हाल ही में हुए एक विरोध-प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा और बयानों को लेकर अब समाज के विभिन्न वर्गों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोकतांत्रिक विरोध की आड़ में एक विशिष्ट वर्ग और विचारधारा के विरुद्ध की गई ‘अशोभनीय’ टिप्पणियों को लेकर प्रबुद्ध वर्ग ने इसे समाज को बांटने वाली राजनीति करार दिया है।

मर्यादा और लोकतंत्र पर प्रहार

​सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की जा रही है। मामले पर क्षोभ व्यक्त करते हुए यह बात उभरकर सामने आई है कि असहमति और विरोध जताना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन किसी भी समाज, वर्ग या ‘ब्राह्मणवाद’ के नाम पर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करना कतई न्यायसंगत नहीं है। इस तरह की भाषा न तो किसी को न्याय दिला सकती है और न ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकती है।

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वामपंथी विचारधारा पर निशाना

​विरोध की इस शैली को राष्ट्र और समाज के लिए घातक बताते हुए ‘वामपंथी सोच’ की आलोचना की गई है। प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि ऐसी विचारधाराएं जो सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास करती हैं, वे राष्ट्रहित में नहीं हो सकतीं।

​”आत्मसम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी हमें सवाल उठाना तो सिखाती है, लेकिन भाषा की मर्यादा तोड़ना नहीं। जब विरोध गाली-गलौज और अपमान का रूप ले ले, तो वह विमर्श नहीं, बल्कि अराजकता है।”

 

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सनातन मूल्यों की रक्षा का आह्वान

​इस घटनाक्रम के बाद ‘सत्य सनातन’ के उद्घोष के साथ समाज के गौरव और गौरवशाली परंपराओं को अक्षुण्ण रखने की अपील की गई है। साथ ही, यह संदेश भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी प्रकार की वैचारिक कट्टरता समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर धकेलती है।

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​प्रशासन और जागरूक नागरिकों से अपेक्षा की जा रही है कि वे सार्वजनिक मंचों पर भाषा की गरिमा बनाए रखने के लिए संकल्पित हों, ताकि लोकतंत्र की पवित्रता बनी रहे।

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