नई दिल्ली: देश के उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) में समानता सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026’ ने एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। 15 जनवरी 2026 से प्रभावी हुए इन नियमों को लेकर सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों और शिक्षकों में भारी नाराजगी और भय का माहौल है। सोशल मीडिया से लेकर कैंपस तक इसे ‘एकतरफा’ और ‘दुरुपयोग की संभावना वाला’ कानून बताया जा रहा है।
विवाद की मुख्य जड़: OBC को भी भेदभाव की परिभाषा में शामिल करना
इस नए नियम की सबसे बड़ी चर्चा इसकी परिभाषा को लेकर है। पहली बार जातिगत भेदभाव की श्रेणी में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल किया गया है। यूजीसी के शुरुआती ड्राफ्ट में ओबीसी शामिल नहीं था, लेकिन दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की सिफारिशों के बाद इसे अंतिम नियमों में जगह दी गई। सामान्य वर्ग के छात्रों का तर्क है कि अब यह कानून “दूसरा SC/ST एक्ट” बन गया है, जिसका इस्तेमाल बदले की भावना से किया जा सकता है।
संसदीय समिति की भूमिका और कड़े प्रावधान
कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली शिक्षा संबंधी संसदीय समिति ने 8 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर ही कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए:
- इक्विटी कमेटी का गठन: हर कॉलेज में एक ‘इक्विटी कमेटी’ बनेगी, जिसमें आधे से अधिक सदस्य SC, ST, OBC, महिला और दिव्यांग श्रेणियों से होंगे।
- झूठी शिकायत पर सजा का प्रावधान हटा: सबसे ज्यादा विरोध इस बात का है कि यूजीसी ने ड्राफ्ट से ‘गलत शिकायत करने पर जुर्माने’ का प्रावधान हटा दिया है। इससे सामान्य वर्ग को डर है कि किसी को भी फंसाना अब आसान हो जाएगा।
- सख्त समय सीमा: शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर प्राथमिक कार्रवाई शुरू करनी होगी और 60 दिनों के भीतर जांच पूरी करनी होगी।
सामान्य वर्ग की आशंकाएं: ‘दोषी मानकर ही शुरू होगी जांच’
सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों का मानना है कि ये नियम उन्हें पहले से ही ‘शोषक’ (Oppressor) और पिछड़ों को ‘पीड़ित’ मानकर चलते हैं। उनकी मुख्य चिंताएं निम्नलिखित हैं:
- करियर पर खतरा: झूठी शिकायत होने पर भी करियर पर दाग लगने का डर।
- कोई सुरक्षा कवच नहीं: यदि सामान्य वर्ग का छात्र भेदभाव का शिकार होता है, तो उसके लिए इस रेगुलेशन में कोई विशेष प्रावधान नहीं है।
- संस्थानों पर दबाव: नियमों का पालन न करने पर यूजीसी संस्थानों की मान्यता रद्द कर सकता है या फंड रोक सकता है, जिससे कॉलेज प्रशासन दबाव में आकर बिना निष्पक्ष जांच के कार्रवाई कर सकता है।
क्या होगी सजा?
यदि किसी छात्र पर भेदभाव का आरोप सिद्ध होता है, तो ‘इक्विटी कमेटी’ की सिफारिश पर संस्थान उस पर भारी जुर्माना लगा सकता है, उसे सस्पेंड कर सकता है या फिर संस्थान से निष्कासित (Rusticate) भी कर सकता है। गंभीर मामलों में पुलिस को भी सूचित किया जाएगा।
रोहित वेमुला मामले से शुरू हुआ था सफर
बता दें कि ये गाइडलाइंस सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के बाद तैयार की गई हैं, जिसमें रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों का हवाला देते हुए 2012 के पुराने नियमों को और अधिक प्रभावी बनाने की बात कही गई थी। यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन डॉ. विनीत जोशी के नेतृत्व वाली टीम ने इसका ड्राफ्ट तैयार किया था।
अग्रसर भारत की राय: कैंपस में सामाजिक समरसता जरूरी है, लेकिन कानून का संतुलन भी अनिवार्य है। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार और यूजीसी इन बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और सामान्य वर्ग की चिंताओं पर संज्ञान लेते हैं या नहीं।
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