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भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को एक सुरक्षा कवच के रूप में लागू किया गया था। किंतु वर्तमान समय में, इस कानून के व्यावहारिक प्रयोग और इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर सामान्य और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में व्यापक विमर्श छिड़ा हुआ है।

विवाद के मुख्य बिंदु: एक विश्लेषण

​इस विषय पर विभिन्न पक्षों के तर्क और वर्तमान स्थिति को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:

  • उत्पीड़न की सार्वभौमिकता: आलोचकों का तर्क है कि ‘उत्पीड़न’ किसी जाति विशेष तक सीमित नहीं है। मानसिक या शारीरिक शोषण किसी भी वर्ग (सामान्य, ओबीसी या दलित) के व्यक्ति के साथ हो सकता है। ऐसे में कानून का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जो केवल पीड़ित के न्याय पर केंद्रित हो, न कि उसकी जाति पर।
  • दुरुपयोग की आशंका: कई मामलों में यह देखा गया है कि आपसी रंजिश या निजी विवादों को निपटाने के लिए इस कानून के कड़े प्रावधानों (जैसे बिना जांच तत्काल गिरफ्तारी) का उपयोग एक हथियार के रूप में किया जाता है। इससे निर्दोष व्यक्तियों का सामाजिक और मानसिक उत्पीड़न होने का भय बना रहता है।
  • संविधानिक संतुलन: उच्चतम न्यायालय ने भी पूर्व में ‘न्यायिक जांच’ और ‘प्रारंभिक छानबीन’ की आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि न्याय की मूल भावना सुरक्षित रहे और किसी भी निर्दोष को दंड न मिले।

समाधान का मार्ग: सरकार और समाज की भूमिका

​कानून को रद्द करना या यथावत रखना ही एकमात्र विकल्प नहीं है; समाधान ‘संशोधन और सतर्कता’ के बीच कहीं स्थित है। एक न्यायसंगत समाज के लिए निम्नलिखित सुधार प्रभावी हो सकते हैं:

    1. निष्पक्ष प्रारंभिक जांच: कानून में ऐसा प्रावधान होना चाहिए जहाँ गिरफ्तारी से पूर्व एक राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) स्तर की जांच अनिवार्य हो, ताकि झूठे मुकदमों को शुरुआती स्तर पर ही छांटा जा सके।
    2. दुरुपयोग पर दंड: यदि यह सिद्ध हो जाए कि कानून का प्रयोग दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी को फंसाने के लिए किया गया है, तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध भी सख्त कार्यवाही का प्रावधान होना चाहिए।
    3. जाति-निरपेक्ष न्याय: सरकार को ऐसे कानूनी ढांचे पर विचार करना चाहिए जहाँ ‘उत्पीड़न’ की परिभाषा व्यापक हो और हर नागरिक को त्वरित सुरक्षा मिले, चाहे वह किसी भी श्रेणी से आता हो।

निष्कर्ष: कानून का उद्देश्य किसी वर्ग को डराना नहीं, बल्कि शोषित को न्याय दिलाना होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह सभी समुदायों के प्रतिनिधियों से संवाद कर इस कानून में ऐसे सुधारात्मक बदलाव लाए, जिससे वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिले और निर्दोषों को सुरक्षा की गारंटी।

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