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कुमाऊं में जातिगत वर्चस्व की होड़, तो गढ़वाल में ‘गढ़वाल बनाम कुमाऊं’ की खाई; क्या यही उत्तराखंड की सबसे बड़ी सच्चाई है?


देहरादून। उत्तराखंड का भूगोल जितना विविध है, उतनी ही विविध इसकी राजनीति और सामाजिक बनावट भी। राज्य के दो बड़े हिस्से — गढ़वाल मंडल और कुमाऊं मंडल — भौगोलिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी अकसर खींचतान का शिकार रहे हैं। यह खाई समय-समय पर प्रदेश की राजनीति, नौकरशाही और सामाजिक जीवन में झलकती रही है।

कुमाऊं: जातिगत वर्चस्व की खींचतान

कुमाऊं मंडल में ठाकुर, ब्राह्मण और आर्य जातियों के बीच राजनीतिक पकड़ और प्रभाव को लेकर अक्सर अंदरूनी खींचतान देखी जाती है। चुनावों में टिकट बंटवारे से लेकर संगठनात्मक खेमेबाज़ी तक, यह जातिगत खिंचाव स्पष्ट तौर पर नजर आता है। यही कारण है कि कुमाऊं की राजनीति को अक्सर “जातिगत समीकरणों का अखाड़ा” भी कहा जाता है।

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गढ़वाल: ‘गढ़वाल बनाम कुमाऊं’ का विवाद

गढ़वाल की स्थिति कुछ अलग है। यहां जातिगत खींचतान उतनी मुखर नहीं दिखती, बल्कि यहां का बड़ा मुद्दा है — “गढ़वाल बनाम कुमाऊं।” गढ़वाल क्षेत्र में जातियों से ऊपर उठकर क्षेत्रीय पहचान हावी हो जाती है। गढ़वाल के लोगों के बीच यह धारणा गहरी है कि कुमाऊं से आने वाले नेता प्रशासन और संसाधनों पर कब्जा जमाते हैं। यही वजह है कि यहां जातीय राजनीति से ज्यादा “क्षेत्रीय अस्मिता” महत्वपूर्ण हो जाती है।

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राज्य निर्माण से लेकर आज तक खाई बरकरार

2000 में जब उत्तराखंड अलग राज्य बना, तब उम्मीद थी कि “कुमाऊं–गढ़वाल” के बीच की खाई धीरे-धीरे भर जाएगी। लेकिन दो दशक से ज्यादा समय बाद भी यह विभाजन कहीं न कहीं मौजूद है। राजधानी स्थायी रूप से कहाँ होगी (देहरादून या गैंरसैंण), नौकरशाही किस मंडल से ज्यादा आती है, बड़े पदों पर किस मंडल का दबदबा है — जैसे सवाल अक्सर विवाद की जड़ बन जाते हैं।

सच्चाई: क्षेत्रीय खींचतान ने रोक रखा विकास

विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय और जातिगत राजनीति ने विकास की धार को कमजोर किया है। कुमाऊं में जहां जातिगत समीकरण नेताओं को तोलते हैं, वहीं गढ़वाल में क्षेत्रवाद बड़े निर्णयों पर असर डालता है। नतीजतन, जनता की मूलभूत समस्याएं — पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा — पीछे छूट जाती हैं।

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👉 निष्कर्ष
उत्तराखंड की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि यहां समाज और राजनीति अभी भी “कुमाऊं बनाम गढ़वाल” की खींचतान और जातिगत वर्चस्व की जद्दोजहद में उलझा हुआ है। जब तक यह खाई पाटी नहीं जाती, तब तक राज्य अपनी असली क्षमता के अनुसार तरक्की की राह पर तेजी से नहीं बढ़ पाएगा।

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