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बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा: दशकों पुराना संघर्ष फिर तेज, वन अधिकार अधिनियम 2006 को बनाया आधार

हल्द्वानी/लालकुआं (नैनीताल):

नैनीताल जनपद के प्रमुख क्षेत्र बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा दिलाने की मांग एक बार फिर उग्र हो गई है। दशकों से बुनियादी हक और भूमि स्वामित्व के लिए संघर्ष कर रहे हजारों ग्रामीणों ने आज आयोजित एक दिवसीय धरने के माध्यम से सरकार के खिलाफ हुंकार भरी। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि प्रशासन और सरकार की हीलाहवाली के कारण यह मुद्दा पिछले एक साल से फाइलों में दबा हुआ है।

कानूनी पेंच: ‘वन अधिकार अधिनियम’ बनाम ‘वन संरक्षण अधिनियम’

​धरने को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर सरकार को घेरा। मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे:

  • वन अधिकार अधिनियम 2006 (FRA): प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इस कानून की धारा 3(1)(h) और 4(7) के तहत वन गांवों को सीधे राजस्व गांव में बदलने का सुगम प्रावधान है। इसमें किसी अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता नहीं होती। देशभर में हजारों गांवों को इसी कानून के तहत हक मिला है।
  • वन संरक्षण अधिनियम 1980: ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर इस जटिल कानून का सहारा ले रही है, जिसमें समकक्ष भूमि और 40 वर्षों तक संरक्षण जैसे कड़े नियम हैं। इसे जनता को गुमराह करने और प्रक्रिया को लटकाने की साजिश बताया गया।
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प्रशासनिक उदासीनता पर गहरा आक्रोश

​प्रदर्शनकारियों ने पूर्व जिलाधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि जिला स्तरीय समिति से मंजूरी मिलने और पूरी पत्रावली शासन को भेजे जाने के बावजूद, शासन ने अधिसूचना जारी करने के बजाय फाइल वापस जिलाधिकारी को ही भेज दी। ग्रामीणों का कहना है कि यह “वोट बैंक की राजनीति” के अलावा और कुछ नहीं है।

​”जब पूरे भारत में इस कानून के तहत हजारों एकड़ वन भूमि राजस्व गांवों में तब्दील हो चुकी है, तो उत्तराखंड में यह रफ्तार इतनी धीमी क्यों? यहां अब तक मात्र छह गांवों को ही यह दर्जा मिल पाया है।” – वक्ता, धरना प्रदर्शन

 

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भविष्य की रणनीति: अब राष्ट्रीय स्तर पर उठेगी आवाज

​आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने तत्काल अधिसूचना जारी नहीं की, तो इस आंदोलन को प्रदेश व्यापी और राष्ट्रीय स्तर पर ले जाया जाएगा।

  • सेमिनार का आयोजन: जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर एक सेमिनार आयोजित किया जाएगा।
  • अन्य राज्यों का समर्थन: आंदोलनकारी अन्य राज्यों की वन अधिकार समितियों से संपर्क कर समर्थन जुटाएंगे।
  • युवा और महिलाओं की भागीदारी: इस बार के प्रदर्शन में युवाओं और महिलाओं की बड़ी संख्या ने स्पष्ट कर दिया है कि अब ग्रामीण भूमि स्वामित्व और विकास योजनाओं के लाभ के बिना पीछे हटने वाले नहीं हैं।
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अग्रसर भारत न्यूज डेस्क

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