खबर शेयर करें -

लालकुआं (बिंदुखत्ता)। तराई की उपजाऊ मिट्टी से उठी ‘राजस्व ग्राम’ की मांग अब एक प्रचंड जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। वर्षों से अपने अस्तित्व और पहचान की लड़ाई लड़ रहे बिंदुखत्ता के निवासियों के धैर्य का बांध अब टूटता नजर आ रहा है। इस जन-संघर्ष के बीच भाजपा के युवा तुर्क और लालकुआं दुग्ध संघ के पूर्व अध्यक्ष भरत नेगी के साहसिक वक्तव्य ने न केवल आंदोलन को नई ऊर्जा दी है, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी खलबली मचा दी है।

​अपनी ही पार्टी को दिखाया आईना

एक विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए भरत नेगी ने दो-टूक शब्दों में कहा कि बिंदुखत्ता की जनता को अब और अधिक प्रतीक्षा की आग में नहीं झोंका जा सकता। उन्होंने किसी दलगत राजनीति की परवाह किए बिना अपनी ही सरकार और जनप्रतिनिधियों को नसीहत दी कि अब समय कोरे आश्वासनों का नहीं, बल्कि धरातल पर ठोस निर्णय लेने का है। नेगी ने स्पष्ट किया कि जब बात जनता के सम्मान और मूलभूत अधिकारों की हो, तो राजनीति गौण हो जाती है


​वर्षों का संघर्ष और पहचान का संकट

यह भी पढ़ें -  खटीमा की दलित बस्ती में पहुंचे सीएम धामी, ग्रामीणों के साथ किया भोजन

गौरतलब है कि बिंदुखत्ता लंबे समय से राजस्व ग्राम के दर्जे की मांग कर रहा है। राजस्व ग्राम न होने के कारण यहाँ के निवासी आज भी मालिकाना हक और कई सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। भरत नेगी ने भावुक होते हुए कहा, “हाथ में माइक और सामने उमड़ा यह जनसैलाब केवल भीड़ नहीं, बल्कि वर्षों से दबे हुए दर्द की गूँज है। राजस्व ग्राम बिंदुखत्ता का अधिकार है, और इसे लेकर अब कोई समझौता नहीं होगा।”

यह भी पढ़ें -  ​अमझड़ साधन सहकारी समिति की वार्षिक बैठक संपन्न: 4.45 करोड़ का कारोबार, 12 लाख का मुनाफा; किसानों को 15% लाभांश

​दलगत राजनीति से ऊपर उठा मुद्दा

कार्यक्रम के दौरान ‘राजस्व ग्राम बनाओ’ के नारों से पूरा वातावरण गुंजायमान रहा। भरत नेगी की इस साहसिक अपील ने यह सिद्ध कर दिया है कि यह मुद्दा अब पक्ष-विपक्ष की परिधि से बाहर निकलकर जन-आंदोलन बन चुका है। आंदोलनकारियों का साफ संदेश है कि अब उनकी आवाज दबने वाली नहीं है।

यह भी पढ़ें -  2 अक्टूबर को ‘नो UPI डे’: बाजार जाने से पहले जान लें, किन दुकानों पर नहीं हो सकता डिजिटल भुगतान

​सरकार की परीक्षा का समय

अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार अपने ही कर्मठ नेता की इस स्पष्ट और तर्कसंगत मांग को गंभीरता से लेगी? या फिर बिंदुखत्ता की जनता के हिस्से में एक बार फिर केवल प्रतीक्षा ही आएगी?

​बिंदुखत्ता अब मात्र एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तराखंड में जन-अधिकार, स्वाभिमान और पहचान की लड़ाई का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा है।

​ब्यूरो रिपोर्ट: अग्रसर भारत न्यूज़

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad