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बिंदुखत्ता/लालकुआं

(अग्रसर भारत न्यूज)।

लालकुआं के इंद्रानगर स्थित श्री बिंदेश्वर महादेव मंदिर में आयोजित नौ दिवसीय ‘श्रीमद् देवी भागवत महाज्ञान यज्ञ’ के सातवें दिन भक्ति की अविरल धारा बही। कथा व्यास पं. मनोज कृष्ण जोशी ने श्रद्धालुओं को अध्यात्म का सार समझाते हुए कहा कि मां जगदम्बा की भक्ति और उनका निरंतर चिंतन ही मनुष्य को इस नश्वर संसार से पार लगाने का एकमात्र सशक्त माध्यम है।

मां की कृपा से खुलते हैं उन्नति के द्वार

​व्यास पीठ से प्रवचनों की वर्षा करते हुए पं. मनोज कृष्ण जोशी ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में मां भगवती का स्मरण करना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब कोई भक्त सच्चे मन से मां का ध्यान करता है, तो उसके जीवन के सभी कष्ट और व्याधियां स्वतः ही समाप्त होने लगती हैं। उन्होंने कहा, “मां की कृपा मात्र से न केवल आत्मिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन में प्रगति और सफलता के मार्ग भी प्रशस्त होते हैं।”

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इन आठ दोषों का त्याग है अनिवार्य

​कथा के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पं. जोशी ने जीवन में नैतिक सुधार पर बल दिया। उन्होंने मानव जीवन के आठ प्रमुख शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या और द्वेष—से दूर रहने का आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक मनुष्य इन विकारों से मुक्त नहीं होता, तब तक वह सच्ची भक्ति का अधिकारी नहीं बन सकता। आत्मसंयम, सदाचार और पवित्र आचरण ही आध्यात्मिक उन्नति की असली नींव है।

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गणमान्य व्यक्तियों की रही गरिमामयी उपस्थिति

​इस धार्मिक अनुष्ठान में क्षेत्रीय विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट और पूर्व विधायक नवीन दुमका वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हेमवती नंदन दुर्गापाल सहित कई गणमान्य लोगों ने शिरकत की। कार्यक्रम को सफल बनाने में मंदिर समिति के अध्यक्ष शेर सिंह दानू, सचिव देव सिंह देवली, पुजारी नंदन गोस्वामी, कोषाध्यक्ष गोकुलानंद उपाध्याय सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं का विशेष योगदान रहा।

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अग्रसर भारत न्यूज़ का समाज के लिए संदेश

“भक्ति केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे हमारे चरित्र में झलकना चाहिए।” >

आज के भागदौड़ भरे युग में हम अक्सर भौतिक सुखों के पीछे भागते हुए मानसिक शांति खो देते हैं। श्रीमद् देवी भागवत हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति बाहरी संसाधनों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर के ‘आत्म-संयम’ और ‘परोपकार’ में छिपी है। आइए, हम अपने भीतर के विकारों (क्रोध, लोभ और द्वेष) को त्याग कर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां भक्ति का अर्थ—प्रेम, करुणा और एक-दूसरे की सहायता करना हो।

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