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नैनीताल: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए ‘यूसीसी 2025’ को चुनौती देती कई जनहित याचिकाओं समेत प्रभावित लोगों की तरफ से दायर याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की. सुनवाई के दौरान भीमताल निवासी सुरेंद्र सिंह नेगी की तरफ से कहा गया कि प्रदेश में यूसीसी बिल जनवरी से लागू हो गया है. इससे प्रभावित लोगों ने कई याचिकाएं कोर्ट में दायर की हैं. लेकिन अभी तक याचिकाओं में बनाए गए कुछ ही पक्षकारों की तरफ से जवाब न्यायालय में पेश किया गया. अभी तक केंद्र सरकार का जवाब भी नहीं आया. इसलिए शीघ्र ही केंद्र सरकार का जवाब तलब कराया जाए. जिसपर कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि तीन सप्ताह के भीतर जवाब पेश करें. कोर्ट ने मामले की सुनवाई हेतु अगली तिथि 14 जुलाई की नियत की है.

मामले के अनुसार यूसीसी को लेकर अभी तक उच्च न्यायालय में प्रभावित और अन्य समुदायों ने चुनौती दी है. जिन पर सुनवाई करते हुए पूर्व से अब तक कोर्ट ने जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश राज्य सरकार को दिए थे. राज्य सरकार ने अब इसमें अपना जवाब पेश कर दिया है. अभी तक जो याचिकाएं दायर की गई हैं, उनमें से खासकर मुस्लिम सुमदाय और लिव इन रिलेशन में रह रहे लोगों के द्वारा दायर की गई हैं. लिव इन रिलेशन में रह रहे लोगों का कहना है कि जो फॉर्म रजिस्ट्रेशन के लिए उनसे भरवाया जा रहा है, उसमें उनसे कई तरह की पूर्व की जानकारी मांगी गई है. अगर वे पूर्व की जानकारी फॉर्म में फील करते हैं तो उन्हें जानमाल का खतरा भी हो सकता है. वर्तमान की शर्तों पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन पूर्व की जानकारी देना उनकी व्यक्तिगत प्राइवेसी के खिलाफ है. इसको संसोधित किया जाए.

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पूर्व में भीमताल निवासी सुरेश सिंह नेगी ने यूसीसी के विभिन्न प्रावधानों को जनहित याचिका के रूप में चुनौती दी थी. जिसमें उनके द्वारा मुख्यतः ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के प्रावधानों को चुनौती दी गई. उन्होंने लिव इन रिलेशनशिप को असंवैधानिक ठहराया है.

याचिका में कहा गया कि जहां नॉर्मल शादी के लिए लड़के की उम्र 21 और लड़की की 18 वर्ष होनी आवश्यक है. वहीं लिव इन रिलेशनशिप में दोनों की उम्र 18 वर्ष निर्धारित की गई है. साथ में उनसे होने वाले बच्चे कानूनी बच्चे कहे जाएंगे या वे वैध माने जाएंगे.

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दूसरा यह है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी लिव इन रिलेशनशिप से छुटकारा पाना चाहता है तो वह एक साधारण से प्रार्थना पत्र रजिस्ट्रार को देकर करीब 15 दिन के भीतर अपने पार्टनर को छोड़ सकता है या उससे छुटकारा पा सकता है. जबकि साधारण विवाह में तलाक लेने के लिए पूरी न्यायिक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है और दशकों के बाद तलाक होता है. वह भी पूरा भरण पोषण देकर. कुल मिलाकर देखा जाए तो राज्य के नागरिकों को जो अधिकार संविधान द्वारा प्राप्त हैं, राज्य सरकार ने उसमें हस्तक्षेप करके उनके अधिकारों का हनन किया है.यूसीसी में राज्य के नागरिकों को जो अधिकार संविधान द्वारा दिए हैं, उनको भी अनदेखा किया गया है.

याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि भविष्य में इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं. सभी लोग शादी न करके लिव इन रिलेशनशिप में ही रहना पसंद करेंगे. यही नहीं 2010 के बाद इसका रजिस्ट्रेशन कराना आवश्यक है, न करने पर तीन माह की सजा या 10 हजार का जुर्माने तक का प्रावधान रखा गया है. कुल मिलाकर देखा जाए तो लिव इन रिलेशनशिप एक तरह की वैध शादी ही है. कानूनी प्रक्रिया अपनाने में अंतर है.

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वहीं दूसरी याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार ने यूसीसी बिल पास करते वक्त इस्लामिक रीति रिवाज, कुरान और उसके अन्य प्रावधानों की अनदेखी की गई है. जैसे की कुरान व उसके आयातों के अनुसार पति की मौत के बाद पत्नी उसकी आत्मा की शांति के लिए 40 दिन तक प्रार्थना करती है. यूसीसी उसको प्रतिबंधित करता है. दूसरा, शरीयत के अनुसार संगे संबंधियों को छोड़कर इस्लाम में अन्य से निकाह करने का प्रावधान है. यूसीसी में उसकी अनुमती नहीं है. तीसरा, शरीयत के अनुसार संपत्ति के मामले में पिता अपनी संपत्ति का सभी बेटों को बांटकर उसका एक हिस्सा अपने पास रखकर, जब चाहे दान दे सकता है. यूसीसी उसकी भी अनुमति नहीं देता. इसलिए इसमें संशोधन किया जाए.

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