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लालकुआं/कार रोड: लालकुआं क्षेत्र के कार रोड स्थित एक मोबाइल शॉप में बीते बुधवार सांझ उस वक्त हड़कंप मच गया, जब खूंखार सांडों की लड़ाई दुकान के भीतर तक जा पहुंची। सांडों के इस आतंक ने न केवल दुकान स्वामी का आर्थिक रूप से कमर तोड़ दी है, बल्कि पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है।

करीब डेढ़ घंटे तक चला ‘मौत का खेल’

​प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कार रोड पर दो सांड आपस में भिड़ गए और लड़ते-लड़ते अचानक एक मोबाइल शॉप के भीतर घुस गए। दुकान के भीतर सांडों ने ऐसा कोहराम मचाया कि चंद मिनटों में ही दुकान के महंगे शीशे, काउंटर और डिस्प्ले पूरी तरह चकनाचूर हो गए। दुकान स्वामी ने बमुश्किल भागकर अपनी जान बचाई। करीब डेढ़ घंटे की कड़ी मशक्कत और भारी जोखिम उठाने के बाद सांडों को दुकान से बाहर निकाला जा सका।

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दुकानदार का भारी नुकसान, कौन भरेगा हर्जाना?

​सांडों की इस भिड़ंत में दुकान स्वामी को हजारों रुपये का नुकसान हुआ है। पीड़ित दुकानदार का कहना है कि उनकी मेहनत की कमाई पल भर में बर्बाद हो गई। सवाल यह उठता है कि नगर प्रशासन और पशुपालन विभाग की लापरवाही का खामियाजा एक आम व्यापारी क्यों भुगते?

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खूनी संघर्ष और दहशत के साए में ग्रामीण

​यह कोई पहली घटना नहीं है। लालकुआं और आसपास के ग्रामीण इलाकों में आवारा सांडों का आतंक आए दिन किसी न किसी की जान ले रहा है। कई लोग इन सांडों के हमले में अपनी जान गंवा चुके हैं, तो कई गंभीर रूप से घायल होकर अस्पतालों में पड़े हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन को बार-बार आगाह करने के बावजूद ‘कांजी हाउस’ या आवारा पशुओं के प्रबंधन को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है।

अग्रसर भारत का सीधा सवाल: आखिर कब जागेगा प्रशासन?

​क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी या सामूहिक जनहानि का इंतजार कर रहा है? आवारा पशुओं के मुद्दे पर सरकार की चुप्पी जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।

  • हमारी मांग है कि:
  1. ​पीड़ित दुकानदार को तत्काल उचित मुआवजा दिया जाए।
  2. ​क्षेत्र के आवारा पशुओं को अविलंब गौशालाओं में भेजा जाए।
  3. ​लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
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“अगर जनता सुरक्षित नहीं है, तो विकास के दावों का क्या अर्थ? प्रशासन कुंभकर्णी नींद से जागे और कार रोड सहित पूरे लालकुआं को इस आतंक से मुक्ति दिलाए।”

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