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फरवरी अप्रैल और जुलाई में तीन लोगों की सांडों के हमले में मौत हुई थी। न जाने कितने लोग इनकी वजह से चोट खा चुके हैं। लेकिन सरकारी विभागों के पास मृतकों और घायलों का कोई आंकड़ा नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि वन्यजीवों के हमले में घायल और मृतकों का पूरा रिकार्ड रखने के साथ वन विभाग मुआवजा भी देता है।

फरवरी, अप्रैल और जुलाई में तीन लोगों की सांडों के हमले में मौत हुई थी। न जाने कितने लोग इनकी वजह से चोट खा चुके हैं। लेकिन सरकारी विभागों के पास मृतकों और घायलों का कोई आंकड़ा नहीं है। गौर करने वाली बात यह है कि वन्यजीवों के हमले में घायल और मृतकों का पूरा रिकार्ड रखने के साथ वन विभाग मुआवजा भी देता है। लेकिन शहरी क्षेत्र में नई समस्या बन चुके छुट्टा पशु अगर किसी के जीवन को खतरा पहुंचाएं तो उपचार कराने के पैसे भी जेब से भरने पड़ते हैं।

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हल्द्वानी में अवारा पशुओं खासकर सांडों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। पार्षदों से लेकर स्थानीय लोग समस्या के समाधान के लिए ज्ञापन देने के साथ धरना-प्रदर्शन भी कर चुके हैं। लेकिन कुर्सी से चिपके अधिकारी समाधान खोजने में फिलहाल असमर्थ नजर आ रहे हैं। समस्या से निजात दिलाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी नगर निगम के पास है। लेकिन उसके पास न सांड पकड़ने के संसाधन हैं और न ही विशेषज्ञ।

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घायलों के आंकड़े तो दूर की बात है। स्थायी समाधान के लिए सरकारी तंत्र को धरातल पर उतरना पड़ेगा। तभी गोशाला के लिए जमीन मिलेगी और शहर इस समस्या से बाहर आ सकेगा। बैठकें सिर्फ औपचारिकता पूरी कर सकती है। इनसे समाधान नहीं निकलता।

शनिवार को आंखों देखा हाल

निगम दफ्तर के आगे बीच सड़क पर गोवंशीय की कतार दिखी।
मुखानी में खाटू श्याम मंदिर के पास एक सांड सड़क पर दिखा।
राजपुरा में अवारा गोवंशीय पशुओं का जमावड़ा नजर आ रहा था।
बरेली रोड पर गांधी स्कूल के पास सड़क किनारे सांडों का झुंड।

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वन्यजीवों से मौत पर छह लाख, घायल होने पर भी मदद

वन्यजीवों के हमले में किसी व्यक्ति की मौत होने पर सरकार ने छह लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की है। इसके अलावा घायल होने पर स्थिति के हिसाब से आर्थिक मदद मिलती है। रेंजर केएल आर्य ने बताया कि घायल को अधिकतम 50 हजार मिलते हैं।

गोवंशीय के लिए भी सड़क पर रोज खतरा

गोवंशीय पशुओं के लिए भी सड़क पर खतरा है। कई बार बड़े वाहन इन्हें टक्कर मार देते हैं। बेसहारा होने की वजह कोई देखभाल भी नहीं करता। सरकारी सिस्टम से ज्यादा कुछ गोसेवक इनके उपचार और खाने की व्यवस्था करने में जुटते हैं।

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