बड़ा सवाल: आखिर किसने दी देर रात तक शोर मचाने की ‘सीक्रेट परमिशन’? कोतवाल का फोन स्विच ऑफ, जनप्रतिनिधियों ने साधी चुप्पी, जनता में भारी आक्रोश।
लालकुआं (उत्तराखंड)।
कहते हैं कि देश और सूबे में कानून सबके लिए बराबर होता है, लेकिन लालकुआं विधानसभा क्षेत्र से जो तस्वीरें और खबरें सामने आ रही हैं, वे कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। आम दिनों में जब हिंदुओं के त्योहार होते हैं, शादियां होती हैं, तो रात के 10 बजते ही पुलिस का डंडा घूम जाता है। डीजे और बैंड-बाजे वालों को ऐसे खदेड़ा जाता है जैसे कोई बड़ा अपराध हो गया हो। यहाँ तक कि त्योहारों के ऐन वक्त पर बिजली कटौती कर दी जाती है। लेकिन कल रात (25 जून 2026) लालकुआं कोतवाली क्षेत्र में जो हुआ, उसने प्रशासन के दोहरे चरित्र और सरकार के दावों की पोल खोल कर रख दी है।
रात 1 बजे तक गूंजता रहा लाउडस्पीकर, सोता रहा प्रशासन
कल रात लालकुआं में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए देर रात 1:00 बजे तक लाउडस्पीकर फुल आवाज में बजता रहा। स्थानीय नागरिकों का सब्र जब जवाब दे गया, तो कुछ जागरूक लोगों ने कोतवाली का रुख किया। जब कोतवाली में तैनात पुलिसकर्मियों से पूछा गया कि इतनी रात गए यह शोर क्यों होने दिया जा रहा है, तो उनका रटा-रटाया जवाब था— “ऊपर से परमिशन है।”
बड़ा सवाल: आखिर यह कैसी परमिशन है? सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों को ताक पर रखकर रात 1 बजे या सुबह 3 बजे तक लाउडस्पीकर बजाने की लिखित अनुमति किसने और क्यों दी? जब स्थानीय लोगों ने इस ‘कथित’ परमिशन का लिखित प्रमाण मांगा, तो पुलिस बगलें झांकने लगी और कोई भी लिखित दस्तावेज नहीं दिखा सकी।
कोतवाल का फोन स्विच ऑफ, नेताओं ने फेरा मुंह
मामले की गंभीरता को देखते हुए जब मीडिया और स्थानीय लोगों ने लालकुआं कोतवाल से संपर्क करने की कोशिश की, तो उनका सरकारी नंबर ‘स्विच ऑफ’ (बंद) आया। कानून व्यवस्था के जिम्मेदार अधिकारी का नंबर बंद होना अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
हद तो तब हो गई जब क्षेत्र के बड़े-बड़े जनप्रतिनिधियों और नेताओं को फोन मिलाया गया। खुद को जनता का सेवक बताने वाले इन नेताओं ने रात के समय फोन उठाना तक मुनासिब नहीं समझा। क्या इन नेताओं को सिर्फ चुनाव के वक्त ही जनता की याद आती है? या फिर इन्हें अपनी ‘गद्दी’ खोने का डर सता रहा है, जिसके चलते ये एक खास वर्ग को खुश करने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति पर उतर आए हैं?
‘हिंदू हित’ की बात करने वाली भाजपा सरकार पर उठे गंभीर सवाल
यह पूरा घटनाक्रम सीधे तौर पर प्रदेश की भाजपा सरकार की नीति और नीयत पर सवालिया निशान खड़ा करता है। जो भाजपा सरकार खुद को ‘हिंदू हितैषी’ और न्यायप्रिय बताती है, उसी के राज में लालकुआं के हिंदू समाज के साथ यह दोहरा व्यवहार क्यों?
- जब हिंदुओं के त्योहार आते हैं, तो प्रशासन को नियमों की याद आ जाती है और लाइटें काट दी जाती हैं।
- लेकिन जब अन्य मौकों पर रात-रात भर लाउडस्पीकर बजते हैं, तो वही प्रशासन आंखें मूंद लेता है।
अगर सरकार वाकई हिंदुओं की इतनी बड़ी हितैषी है, तो इस मामले पर तुरंत संज्ञान क्यों नहीं लिया गया? कोतवाल का नंबर क्यों बंद था और जनप्रतिनिधि क्यों छुपे बैठे रहे?
जनता पूछ रही है— नेताओं को अक्ल कब आएगी?
लालकुआं की जनता अब इस दोहरे रवैये को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वोट बैंक की राजनीति के लिए बहुसंख्यक समाज के त्योहारों और उनकी शांति को बलि नहीं चढ़ाया जा सकता। अब देखना यह होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद शासन-प्रशासन के आला अधिकारी नींद से जागते हैं या फिर लालकुआं में इसी तरह ‘रसूख’ के दम पर कानून की धज्जियां उड़ती रहेंगी।
– ब्यूरो रिपोर्ट, लालकुआं न्यूज़।


