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लालकुआं (नैनीताल)। बबूर गुमटी रेलवे क्रॉसिंग के पास मंगलवार शाम विद्युत लाइन मरम्मत कार्य के दौरान एक दिल दहला देने वाला हादसा सामने आया है। विभागीय कार्य के दौरान बिजली के पोल पर चढ़े एक पूर्व लाइनमैन का अचानक संतुलन बिगड़ गया, जिससे वह सिर के बल सीधे जमीन पर आ गिरा। इस दर्दनाक हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गया है, जिसकी नाजुक हालत को देखते हुए उसे हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल से बरेली के राममूर्ति चिकित्सालय (भोजीपुरा) रेफर किया गया है।

​ठेकेदार कर्मियों की मौजूदगी में हुआ हादसा

​प्राप्त जानकारी के मुताबिक, मंगलवार शाम बबूर गुमटी रेलवे क्रॉसिंग के सामने ठेकेदार के कर्मचारियों द्वारा विद्युत लाइन की मरम्मत का काम किया जा रहा था। इसी बीच पूर्व लाइनमैन प्रेम सिंह कोरंगा वहां पहुंचे और अचानक बिजली के पोल पर चढ़ने लगे। पोल के ऊपरी हिस्से में पहुंचते ही उनका संतुलन खो गया और वह अनियंत्रित होकर सिर के बल नीचे आ गिरे।

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​हादसा होते ही मौके पर चीख-पुकार मच गई। वहां मौजूद विद्युत कर्मियों और स्थानीय नागरिकों ने आनन-फानन में लहूलुहान प्रेम सिंह को सुशीला तिवारी अस्पताल पहुंचाया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें तुरंत राममूर्ति चिकित्सालय भोजीपुरा (बरेली) के लिए रेफर कर दिया।

​’अग्रसर भारत’ विशेष टिप्पणी: एसडीओ का बयान और विभाग की जिम्मेदारी पर उठते सुलगते सवाल

​इस पूरे मामले में विद्युत विभाग के एसडीओ (SDO) का एक आधिकारिक बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘पूर्व लाइनमैन मंगलवार को बिना किसी सूचना के कार्यस्थल पर पहुंचे थे और ठेकेदार के कर्मियों द्वारा बार-बार मना किए जाने के बावजूद वे जबरन पोल पर चढ़ गए, जिसके कारण यह हादसा हुआ।’

लेकिन, एसडीओ का यह बयान गले से नीचे नहीं उतरता। इस पर कई गंभीर और यक्ष प्रश्न खड़े होते हैं जिनका जवाब मिलना बेहद जरूरी है:

  • क्या बिना विभागीय मिलीभगत के कोई पोल पर चढ़ सकता है? एक आम या पूर्व कर्मचारी अचानक चालू या मरम्मत कार्य के अधीन लाइन के पोल पर चढ़ जाए और वहां मौजूद ठेकेदार के कर्मी उसे न रोक पाएं, यह बात हजम नहीं होती। क्या वहां सुरक्षा मानकों (Safety Protocols) का पालन हो रहा था? अगर ठेकेदार के कर्मी वहां मौजूद थे, तो उन्होंने जबरन चढ़ रहे व्यक्ति को शारीरिक रूप से क्यों नहीं रोका या तुरंत शटडाउन की स्थिति को लेकर आला अधिकारियों को सूचित क्यों नहीं किया?
  • विभागीय पल्ला झाड़ने की जल्दबाजी क्यों? हादसा होते ही विभाग ने तुरंत यह बयान जारी कर दिया कि पीड़ित बिना सूचना के आया था। यह सीधे-सीधे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और भविष्य में बनने वाले किसी भी कानूनी या मुआवजे के दावे से बचने की कोशिश जैसा प्रतीत होता है।
  • रोजी-रोटी का संकट और मजबूरी का सवाल: सवाल यह भी है कि आखिर एक ‘पूर्व लाइनमैन’ को ऐसी क्या मजबूरी थी कि वह दूसरों के काम के बीच में जाकर पोल पर चढ़ गया? क्या वह अपनी रोजी-रोटी के जुगाड़ में या दैनिक दिहाड़ी के लालच में वहां गया था? बिजली विभाग में संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) और दैनिक मानदेय पर काम करने वाले श्रमिकों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। अगर कल के दिन पीड़ित को कुछ हो जाता है, तो उसके परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी किसकी होगी?
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निष्कर्ष:

विद्युत विभाग भले ही इस मामले में कागजी तौर पर खुद को पाक-साफ दिखाने की कोशिश करे, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि कार्यस्थल पर लापरवाही हुई है। यदि कोई बाहरी या पूर्व कर्मी पोल पर चढ़ रहा था, तो काम को तुरंत क्यों नहीं रुकवाया गया? शासन-प्रशासन को इस मामले की उच्च स्तरीय जांच करनी चाहिए ताकि घायल कर्मचारी के साथ न्याय हो सके और विभाग अपनी नैतिक जिम्मेदारी से भाग न पाए।