अमेरिका और ईरान के बीच गहराते सैन्य गतिरोध को शांत करने की पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिशें पूरी तरह नाकाम साबित हुई हैं। पाकिस्तानी थल सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर और आंतरिक मामलों के मंत्री मोहसिन नकवी की तेहरान यात्रा बिना किसी सकारात्मक परिणाम के समाप्त हो गई है। वैश्विक कूटनीति के विश्लेषकों का मानना है कि इस विफलता ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर पाकिस्तान की मध्यस्थता की क्षमताओं और उसकी विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
द्विपक्षीय अड़ियल रुख के कारण वार्ता विफल
प्राप्त विवरण के अनुसार, तेहरान में ईरानी नेतृत्व के साथ हुई उच्च स्तरीय बैठक में पाकिस्तान ने दोनों देशों को युद्ध के खतरों से आगाह करते हुए सीधी बातचीत की मेज पर आने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, दोनों ही पक्ष अपने-अपने रुख पर अडिग रहे। ईरानी नेताओं ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (होर्मुज जलडमरूमध्य) पर अपना संप्रभु नियंत्रण बनाए रखने और अमेरिका द्वारा लगाए गए कड़ाके के आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की मांग को पुरजोर तरीके से दोहराया। वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन (ट्रम्प सरकार) ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय आक्रामक गतिविधियों को पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक किसी भी समझौते या रियायत का सवाल ही नहीं उठता।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ता संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था
रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर है। ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिकी दबाव और बढ़ा, तो वह इस समुद्री व्यापारिक मार्ग को पूरी तरह अवरुद्ध कर देगा। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के ‘बंदर अब्बास’ सहित कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए, जिसके प्रतिशोध में ईरान ने भी ड्रोन और मिसाइल दागे हैं।
यदि यह जलमार्ग बंद होता है, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। भारत, चीन और यूरोपीय देशों सहित पूरी दुनिया की कच्चे तेल की आपूर्ति ठप हो जाएगी, जिससे वैश्विक ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आएगा और विश्व अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है।
दोहरी मुसीबत में फंसा पाकिस्तान
इस कूटनीतिक विफलता के बाद पाकिस्तान एक बेहद जटिल भू-राजनीतिक भंवर में फंस गया है। एक तरफ ईरान उसका पड़ोसी देश है, जिसके साथ वह लंबी सीमा, आर्थिक संबंध और सुरक्षा चुनौतियां साझा करता है। दूसरी तरफ, अमेरिका उसका पुराना सहयोगी रहा है, जिससे उसे भारी मात्रा में सैन्य और आर्थिक सहायता मिलती है। इस विफलता के बाद अब इस्लामाबाद को अपनी विदेश नीति और कूटनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा।
विशेषज्ञों का आकलन: पूर्ण युद्ध नहीं, पर जारी रहेंगे छोटे टकराव
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल दोनों देशों के बीच पूर्ण पैमाने पर युद्ध छिड़ने की संभावना कम है, लेकिन छोटे और सीमित सैन्य टकराव लगातार जारी रह सकते हैं। इस क्षेत्रीय अशांति का लाभ उठाकर चीन और रूस जैसे बड़े देश भी इस क्षेत्र में अपनी भूमिका और प्रभाव को बढ़ा सकते हैं। इस विफलता से यह भी साफ हो गया है कि अमेरिका और ईरान जैसे शक्तिशाली देश अब पाकिस्तान जैसे किसी तीसरे देश के बजाय सीधे संवाद को प्राथमिकता देना चाहते हैं।


