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भ्रष्टाचार पर लगाम: जियो-टैगिंग और ऑनलाइन पोर्टल अनिवार्य

​धामी सरकार ने इस बार विकास कार्यों में पारदर्शिता लाने के लिए दो बेहद कड़े और आधुनिक कदम उठाए हैं:

  1. जियो-टैगिंग (Geo-Tagging): विधायक निधि से होने वाले हर एक कार्य की जियो-टैगिंग अनिवार्य होगी, ताकि कागजों पर होने वाले फर्जीवाड़े को रोका जा सके और जमीन पर हो रहे काम की सटीक लोकेशन ट्रैक हो सके।
  2. ऑनलाइन पोर्टल: कार्यों की प्रशासनिक स्वीकृति, बजट के आवंटन, खर्च और भुगतान की पूरी जानकारी के लिए एक पारदर्शी ऑनलाइन पोर्टल तैयार किया जाएगा, जिसे आम जनता भी देख सकेगी।
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क्षेत्र की सीमा तय, लेकिन ‘आपदा’ में मिलेगी छूट

​नियमों के मुताबिक, कोई भी विधायक अपनी निधि का पैसा किसी दूसरे के विधानसभा क्षेत्र में खर्च नहीं कर पाएगा। हालांकि, उत्तराखंड की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए एक विशेष प्रावधान किया गया है—आपदा की स्थिति में विधायक अपनी निधि का 10 प्रतिशत हिस्सा (यानी ₹50 लाख) दूसरे प्रभावित क्षेत्रों में मदद के लिए दे सकेंगे।

अग्रसर भारत मूल्यांकन (News Analysis): क्यों खास है यह फैसला?

1. ‘स्मार्ट गवर्नेंस’ की ओर कदम: सिर्फ बजट जारी करना बड़ी बात नहीं है, बल्कि उस पर जियो-टैगिंग और ऑनलाइन ट्रैकिंग लगाना धामी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को दर्शाता है। इससे ठेकेशाही और भ्रष्टाचार पर सीधी चोट होगी।

2. डेड-मनी नहीं बनेगा पैसा: केवल पूंजीगत मद (Asset Creation) में खर्च की शर्त से यह साफ है कि जनता का पैसा सिर्फ ठोस बुनियादी ढांचे (सड़क, अस्पताल, स्कूल) को खड़ा करने में लगेगा, न कि सरकारी फाइलों और कागजी खर्चों में डूबेगा।

3. आपदा प्रबंधन में संवेदनशीलता: उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में आपदाएं आम हैं। ऐसे में 10% बजट को दूसरे क्षेत्रों के लिए ओपन रखना राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता और एकजुटता को बढ़ावा देने वाला एक व्यावहारिक कदम है।

 

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निष्कर्ष: चुनाव और राजनीति से परे, स्थानीय स्तर पर जनता की बुनियादी जरूरतों को तुरंत पूरा करने के लिए धामी सरकार का यह वित्तीय मैनेजमेंट सराहनीय है। अब जिम्मेदारी विधायकों और नौकरशाही की है कि वे इस पैसे को बिना देरी किए धरातल पर उतारें।