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रिश्तों की मर्यादा और कानूनी संघर्ष के बीच एक चर्चित प्रकरण में नया मोड़ आया है। वर्ष 2018 के एक विवादित मामले में, जहाँ निचली अदालत ने आरोपी देवर को दोषमुक्त कर दिया था, वहीं अब पीड़िता (भाभी) ने न्याय की गुहार लगाते हुए उच्च अदालत का द्वार खटखटाया है। इस अपील पर संज्ञान लेते हुए प्रथम अपर जिला जज, हल्द्वानी की अदालत ने आरोपी को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।

क्या था मामला?

​न्यायिक दस्तावेजों के अनुसार, विवाद की जड़ें वर्ष 2018 से जुड़ी हैं। पीड़िता ने कोतवाली लालकुआं में तहरीर देकर आरोप लगाया था कि 9 मार्च 2018 को उसके देवर ने उसके साथ अभद्रता और डराने-धमकाने का कृत्य किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने 11 मार्च 2018 को आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 (स्त्री की लज्जा भंग करना), 504 (शांति भंग हेतु अपमान) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।

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निचली अदालत का निर्णय और वर्तमान स्थिति

​लंबी कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों के परिशीलन के बाद, 16 फरवरी 2026 को न्यायिक मजिस्ट्रेट (जूनियर डिवीजन), हल्द्वानी की अदालत ने अपना फैसला सुनाया था। उस समय न्यायालय ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को अपर्याप्त माना और ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए आरोपी को बरी कर दिया था।

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न्याय के लिए उच्च अदालत की शरण

​निचली अदालत के फैसले से असंतुष्ट होकर पीड़िता ने अधिवक्ता के माध्यम से 7 अप्रैल 2026 को प्रथम अपर जिला जज की अदालत में अपील दायर की। पीड़िता का तर्क है कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

अदालत की कार्रवाई:

माननीय न्यायाधीश ने अपील को सुनवाई हेतु स्वीकार कर लिया है। न्यायालय ने प्रतिपक्षी (आरोपी) को नोटिस तामील करने के आदेश दिए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 मई 2026 को नियत की गई है।

 

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​वर्तमान में यह प्रकरण पुनः विचाराधीन (Sub-judice) है और क्षेत्र के विधिक गलियारों में इस पर पैनी नजर बनी हुई है।

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