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नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल इन दिनों आस्था, भक्ति और कुमाऊं की लोक संस्कृति के रंग में रंगी हुई है। मां नंदा-सुनंदा के दर्शन के लिए लगातार श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है और नगर का वातावरण मां के जयकारों से भक्तिमय बना हुआ है। आठ दिवसीय 124वां नंदा देवी महोत्सव अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है। बुधवार 23 सितंबर को मां नंदा-सुनंदा का भव्य डोला नगर भ्रमण पर निकलेगा, जिसके बाद विधि-विधान के साथ प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। इसके साथ ही इस वर्ष के नंदा देवी महोत्सव का समापन होगा।

नंदाष्टमी पर हुई थी मां नंदा-सुनंदा की प्राण प्रतिष्ठा

नैनीताल में इस वर्ष नंदा देवी महोत्सव का शुभारंभ 16 सितंबर से हुआ। महोत्सव के दौरान कुमाऊं की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और लोक संस्कृति से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। नंदाष्टमी के अवसर पर 19 सितंबर को ब्रह्ममुहूर्त में मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की विधि-विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठा की गई।

प्राण प्रतिष्ठा के बाद जैसे ही मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुले, बड़ी संख्या में भक्त मां के दर्शन के लिए पहुंचने लगे। सुबह तड़के से ही मंदिर परिसर के आसपास श्रद्धालुओं की कतारें दिखाई दीं। लोगों ने मां नंदा-सुनंदा के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और शांति की कामना की।

मां की प्रतिमाओं के सामने वैदिक मंत्रोच्चार, घंटियों और जयकारों के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। इस दौरान नैनीताल में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए धार्मिक आस्था के साथ-साथ कुमाऊं की पारंपरिक संस्कृति को करीब से देखने का अवसर भी मिला।

कुमाऊं की लोक परंपरा से जुड़ा है नंदा महोत्सव

नंदा देवी महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि कुमाऊं की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से भी गहराई से जुड़ा पर्व है। कुमाऊं मंडल में मां नंदा को विशेष श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। कुमाऊं मंडल की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार नंदा देवी मेले का आयोजन सितंबर महीने में नैनीताल सहित अल्मोड़ा, बागेश्वर, भवाली और कुमाऊं के अन्य क्षेत्रों में भी होता है।

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लोक मान्यता में मां नंदा-सुनंदा के मायके आने और फिर विदाई की परंपरा को बेटी के मायके आने से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि महोत्सव के दौरान जहां मां के आगमन और दर्शन को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह दिखाई देता है, वहीं अंतिम दिन होने वाली विदाई भावुक वातावरण पैदा करती है।

नैनीताल में भी इसी भाव के साथ मां नंदा-सुनंदा की पूजा-अर्चना की जाती है। कुछ दिनों तक मां के दर्शन के बाद अब 23 सितंबर को डोला नगर भ्रमण के लिए निकलेगा और इसके बाद मां की प्रतिमाओं को विदाई दी जाएगी।

धार्मिक आयोजनों के साथ लोक संस्कृति की भी रही धूम

नंदा देवी महोत्सव के दौरान धार्मिक कार्यक्रमों के साथ कुमाऊं की लोक संस्कृति को भी प्रमुखता दी गई। महोत्सव के कार्यक्रमों में झोड़ा, छोलिया, लोकगीत, झांकियां और स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां शामिल रहीं। सोरघाटी से लखियाभूत की विशेष प्रस्तुति भी महोत्सव के आकर्षण का हिस्सा रही।

श्रीराम सेवक सभा प्रांगण और तल्लीताल क्षेत्र में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने महोत्सव को धार्मिक आयोजन के साथ सांस्कृतिक उत्सव का स्वरूप भी दिया। स्थानीय लोगों के साथ बाहर से पहुंचे श्रद्धालुओं और पर्यटकों ने भी इन कार्यक्रमों में रुचि दिखाई।

महोत्सव के दौरान पंचआरती, प्रसाद वितरण, देवी पूजन, दुर्गा सप्तशती पाठ, हवन, कन्या पूजन और महाभंडारे जैसे धार्मिक आयोजन भी हुए। 22 सितंबर को सुंदरकांड और नंदा चालीसा पाठ के साथ नैनी झील में दीपदान का कार्यक्रम भी निर्धारित किया गया था।

मेले में उमड़ी भीड़, स्थानीय कारोबार को भी मिला सहारा

नंदा देवी महोत्सव के साथ नैनीताल में पारंपरिक मेला भी आयोजित किया गया। मल्लीताल डीएसए मैदान में लगे मेले में स्थानीय उत्पादों, खान-पान और विभिन्न प्रकार की दुकानों ने लोगों को आकर्षित किया। स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं और महिला समूहों ने भी अपने पारंपरिक उत्पादों के साथ स्टॉल लगाए।

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महोत्सव के चलते नैनीताल में स्थानीय लोगों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचे। इससे धार्मिक आयोजन के साथ स्थानीय व्यापारिक गतिविधियों में भी रौनक देखने को मिली।

 

कल निकलेगा मां नंदा-सुनंदा का भव्य डोला

महोत्सव का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक चरण बुधवार 23 सितंबर को होगा। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार देवी पूजन के बाद दोपहर करीब 12 बजे मां नंदा-सुनंदा का डोला नगर भ्रमण पर निकलेगा। डोला नगर के विभिन्न मार्गों से होकर गुजरेगा और इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।

डोला भ्रमण के दौरान मां के दर्शन के लिए श्रद्धालु मार्गों के किनारे मौजूद रहेंगे। मां के जयकारों, ढोल-दमाऊं और पारंपरिक लोक संस्कृति की झलक के बीच सरोवर नगरी एक बार फिर भक्तिमय वातावरण में नजर आएगी।

नगर भ्रमण के बाद मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का विधि-विधान के साथ विसर्जन किया जाएगा। इसी के साथ आठ दिनों से चल रहा नंदा देवी महोत्सव संपन्न हो जाएगा।

मां की विदाई के साथ भावुक होगा माहौल

नंदा देवी महोत्सव के समापन का सबसे भावुक पक्ष मां नंदा-सुनंदा की विदाई माना जाता है। कुमाऊं की लोक परंपरा में मां के मायके आने और फिर वापस विदा होने की भावना को बेटी के आगमन और विदाई से जोड़ा जाता है।

नंदाष्टमी पर जब मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा होती है तो इसे मां के मायके आगमन के रूप में देखा जाता है। कई दिनों तक श्रद्धालु मां के दर्शन करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। अब अंतिम दिन डोला नगर भ्रमण के बाद मां की विदाई होगी।

इसी कारण नंदा महोत्सव का अंतिम दिन श्रद्धालुओं के लिए आस्था के साथ भावनाओं से भी जुड़ा होता है। मां के जयकारों के बीच होने वाली विदाई के दौरान बड़ी संख्या में लोग इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं।

सुरक्षा और यातायात व्यवस्था पर भी नजर

महोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन और पुलिस की ओर से सुरक्षा तथा यातायात व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया है। शोभायात्रा और डोला भ्रमण के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने तथा यातायात को सुचारु रखने के लिए पुलिस बल और यातायात कर्मियों की तैनाती की जा रही है।

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डोला भ्रमण को देखते हुए नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों में यातायात व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है। भवाली क्षेत्र में 23 सितंबर को श्रद्धालुओं और वाहनों की भीड़ को देखते हुए यातायात डायवर्जन की व्यवस्था की गई है।

वहीं, नैनीताल की लोअर माल रोड को भी डोला भ्रमण के लिए अस्थायी रूप से खोलने की व्यवस्था की गई है। डोला निकलने के बाद सड़क पर निर्माण कार्य फिर शुरू किया जाएगा।

आठ दिनों तक आस्था और संस्कृति का केंद्र रही सरोवर नगरी

16 सितंबर से शुरू हुआ नंदा देवी महोत्सव अब अपने अंतिम चरण में है। इन आठ दिनों में नैनीताल ने धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम देखा। नयना देवी मंदिर परिसर से लेकर मेला क्षेत्र और शहर के विभिन्न हिस्सों तक मां नंदा-सुनंदा के जयकारे सुनाई दिए।

19 सितंबर को प्राण प्रतिष्ठा के बाद जिस तरह श्रद्धालुओं की भीड़ दर्शन के लिए उमड़ी, उससे महोत्सव के प्रति लोगों की आस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब 23 सितंबर को डोला नगर भ्रमण और विसर्जन के साथ मां की विदाई होगी।

मां नंदा-सुनंदा के डोले के साथ इस वर्ष का महोत्सव भले ही संपन्न हो जाएगा, लेकिन कुमाऊं की लोक स्मृतियों और लोगों के मन में मां के प्रति आस्था का यह पर्व एक बार फिर अपनी गहरी छाप छोड़ जाएगा। सरोवर नगरी से मां नंदा-सुनंदा की विदाई के साथ आठ दिनों तक चला यह धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव अगले वर्ष फिर मां के आगमन की प्रतीक्षा छोड़ जाएगा।

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