लालकुआं/बिंदुखत्ता।
लोकतंत्र में जनता अपना प्रतिनिधि इस उम्मीद के साथ चुनती है कि वह उनके दुखों का निवारण करेगा, लेकिन लालकुआं और बिंदुखत्ता के मौजूदा हालात कुछ और ही बयां कर रहे हैं। चुनाव के समय मोटरसाइकिल पर धूल फांकते हुए गलियों के चक्कर काटने वाले नेता, आज बड़ी गाड़ियों के बंद शीशों के पीछे से जनता की दुर्दशा देख रहे हैं।
राजस्व गांव का ‘झुनझुना’ और जनता का भ्रम
विगत 4 वर्षों से राजस्व गांव का मुद्दा केवल एक चुनावी चुनावी शिगूफा बनकर रह गया है। जनता को कागजों और आश्वासनों के जाल में उलझाकर रखा गया है, जबकि धरातल पर शून्य कार्य हुआ है। आरोप है कि यह केवल अगली बार की दावेदारी पक्की करने के लिए बुना गया एक भ्रमजाल है।
मुख्य बाजार और कार रोड: विकास या विनाश का मार्ग?
लालकुआं मुख्य बाजार और कार रोड की स्थिति आज किसी नरक से कम नहीं है। पूरी सड़क गड्ढों में तब्दील हो चुकी है। दिन भर उड़ती धूल ने न केवल स्थानीय व्यापारियों का व्यापार चौपट कर दिया है, बल्कि लोगों को सांस और फेफड़ों की बीमारियों की सौगात दी है।
“जब जनता इस जहरीली धूल को निगल रही है, तब हमारे सफेदपोश जनप्रतिनिधि दोपहर की चिलचिलाती धूप और धूल में सड़क पर उतरने की जहमत क्यों नहीं उठाते? आज वे जनता के बीच आकर इस धूल को खाएं, तब हम मानेंगे कि वे वास्तव में जनसेवक हैं।” — स्थानीय निवासी
अपराध और उदासीनता का गठजोड़
क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि कुछ जनप्रतिनिधि आम जनमानस की समस्याओं के समाधान के बजाय, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन गतिविधियों को संरक्षण दे रहे हैं जो जनता के लिए परेशानी का सबब हैं। विकास के नाम पर केवल समय काटा जा रहा है ताकि अंतिम वर्ष में कुछ लुभावने वादे करके पुनः सत्ता की सीढ़ी चढ़ी जा सके।
‘अग्रसर भारत’ का सवाल
क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल चुनाव जीतना और अगले चुनाव की बिसात बिछाना है? आखिर कब तक बिंदुखत्ता की जनता इन गड्ढों और धूल भरी राजनीति का शिकार होती रहेगी?


