नैनीताल:( लालकुआं – बिंदुखत्ता) गौला नदी के भू-कटाव पर सामाजिक कार्यकर्ता मोहन कुड़ाई ने सरकार से मांगा 9 वर्षों का हिसाब; वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हेमवती नंदन दुर्गापाल ने सरकार को घेरा, कहा– “जनता के पैसे की बर्बादी बर्दाश्त नहीं”
हल्द्वानी। गौला नदी के किनारे काठगोदाम से लेकर शांतिपुरी तक बसे लगभग 18 ग्राम सभाओं में वर्षों से जारी भीषण भू-कटाव की समस्या अब एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुकी है। हर वर्ष मानसून के दौरान ग्रामीणों की कृषि भूमि, सड़कें, मकान और संपत्तियां नदी में समा जाती हैं, लेकिन सरकार के पास इसका कोई स्थायी समाधान नहीं है। इस गंभीर संकट को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता मोहन कुड़ाई ने जहां सरकार से 9 वर्षों का हिसाब मांगते हुए आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है, वहीं क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और लालकुआं विधानसभा से कांग्रेस टिकट के मजबूत दावेदार/विधायक प्रत्याशी हेमवती नंदन दुर्गापाल ने भी इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया है।
करोड़ों खर्च, फिर भी संकट बरकरार: मोहन कुड़ाई
सामाजिक कार्यकर्ता मोहन कुड़ाई ने सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल दागते हुए कहा कि पिछले लगभग 9 वर्षों में गौला नदी पर चैनलाइजेशन, तट सुरक्षा, बोल्डर पिचिंग और अन्य आपदा प्रबंधन कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए हैं। इसके बावजूद काठगोदाम से लेकर शांतिपुरी तक के दर्जनों गांव आज भी भू-कटाव की जद में हैं।
मोहन कुड़ाई ने सरकार से निम्नलिखित प्रमुख मांगें की हैं:
9 वर्षों का श्वेत पत्र: पिछले 9 सालों में गौला नदी के तटबंध और सुरक्षा कार्यों पर स्वीकृत और व्यय की गई धनराशि का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए।
कार्य की पारदर्शिता: वर्षवार कार्यों की लागत, कार्यदायी संस्थाओं (एजेंसियों) के नाम और गुणवत्ता जांच रिपोर्ट
(Quality Audit) जनता के सामने रखी जाए।
स्वतंत्र ऑडिट: पूरे मामले की एक स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय ऑडिट कराई जाए ताकि सच सामने आ सके कि आखिर इतना बजट ठिकाने लगाने के बाद भी जमीन पर कोई सुधार क्यों नहीं दिखा।
”भ्रष्टाचार और नाकामी का खेल बंद करे सरकार” — हेमवती नंदन दुर्गापाल
इस पूरे मामले में ग्रामीणों की आवाज को बुलंद करते हुए हल्दुचौड़ क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और विधायक प्रत्याशी हेमवती नंदन दुर्गापाल ने सरकार पर तीखा हमला बोला। श्री दुर्गापाल ने कहा कि भाजपा सरकार आपदा प्रबंधन के नाम पर केवल खानापूर्ति कर रही है। हर साल मानसून से ठीक पहले आनन-फानन में कागजी योजनाएं बनती हैं, बजट पास होता है, लेकिन धरातल पर काम शून्य रहता है।
”काठगोदाम से शांतिपुरी तक की 18 ग्राम सभाओं के ग्रामीण हर साल अपनी आंखों के सामने अपनी गाढ़ी कमाई की जमीन और आशियाने नदी में विलीन होते देखते हैं। मोहन कुड़ाई जी ने जो सवाल उठाए हैं, वे सीधे तौर पर जनता की आवाज हैं। कांग्रेस पार्टी इस मांग का पुरजोर समर्थन करती है। सरकार को पाई-पाई का हिसाब देना होगा कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी जनता हर मानसून में खौफ के साये में जीने को क्यों मजबूर है? यदि सरकार के पास कोई स्थायी वैज्ञानिक कार्ययोजना (Scientific Plan) नहीं है, तो वह तत्काल इस्तीफा दे।”
— हेमवती नंदन दुर्गापाल (वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व विधायक प्रत्याशी)
स्थायी और वैज्ञानिक समाधान की मांग
क्षेत्रीय जनता और जनप्रतिनिधियों का साफ कहना है कि हर साल नदी में केवल बोल्डर डाल देने से या औपचारिकता के लिए चैनलाइजेशन करने से यह समस्या हल होने वाली नहीं है। इसके लिए वाडिया इंस्टीट्यूट या केंद्रीय जल आयोग जैसे विशेषज्ञों की देखरेख में एक ‘मास्टर प्लान’ तैयार कर समयबद्ध तरीके से काम होना चाहिए।
अब देखना यह होगा कि सामाजिक कार्यकर्ता मोहन कुड़ाई द्वारा मांगे गए 9 वर्षों के हिसाब और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हेमवती नंदन दुर्गापाल के इस कड़े राजनीतिक रुख के बाद शासन-प्रशासन इस दिशा में क्या कदम उठाता है।
ब्यूरो रिपोर्ट: अग्रसर भारत न्यूज़, लालकुआं बिंदुखत्ता उत्तराखंड।


