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  1. नई दिल्ली | अग्रसर भारत न्यूज

​देश की अदालतों में लंबित करोड़ों मुकदमों और न्याय प्रक्रिया में होने वाली देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। झूठी गवाही (Perjury), फर्जी एफआईआर और गलत हलफनामे दाखिल करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के लिए दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

​यह याचिका भारतीय जनता पार्टी के नेता और वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दाखिल की गई है। उन्होंने कोर्ट के समक्ष इस बात पर जोर दिया कि जब तक झूठ बोलने वालों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक न्याय प्रणाली को सुचारू रूप से चलाना असंभव है।

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याचिका के मुख्य बिंदु और माँगें

​वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिका के माध्यम से कई महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित किया है:

  • कठोर कानून की आवश्यकता: याचिका में मांग की गई है कि झूठी गवाही और फर्जी शिकायत करने वालों के लिए कानून में सख्त संशोधन किए जाएं, ताकि लोग कानून का दुरुपयोग करने से डरें।
  • न्यायिक समय की बर्बादी: उपाध्याय का तर्क है कि भारत की अदालतों में लगभग 5 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा केवल झूठे आरोपों और फर्जी साक्ष्यों पर आधारित है। इससे निर्दोष लोगों का जीवन बर्बाद होता है और कोर्ट का कीमती समय नष्ट होता है।
  • लॉ कमीशन की रिपोर्ट लागू हो: याचिका में विधि आयोग (Law Commission) की उन सिफारिशों को लागू करने की मांग की गई है जो न्यायिक भ्रष्टाचार और झूठे साक्ष्यों को रोकने के लिए दी गई थीं।
  • फर्जी एफआईआर पर कार्रवाई: अक्सर आपसी रंजिश के चलते लोग एक-दूसरे पर गंभीर धाराओं में फर्जी एफआईआर दर्ज करा देते हैं। याचिका में ऐसे मामलों में जांच के बाद शिकायतकर्ता पर ही भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान करने की बात कही गई है।

 

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“झूठ मुक्त न्यायपालिका” का संकल्प

​अश्विनी उपाध्याय ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “सत्यमेव जयते का नारा तभी सार्थक होगा जब अदालत की चौखट पर झूठ बोलने वाले को तत्काल सजा मिले। आज लोग हलफनामे पर बेझिझक झूठ बोलते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि सजा मिलने की संभावना न के बराबर है। हमें एक ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ न्याय केवल सच के आधार पर मिले।”

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सुप्रीम कोर्ट का रुख

​सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे की गंभीरता को स्वीकार करते हुए माना कि यह न्याय प्रशासन में एक बड़ी बाधा है। कोर्ट ने सरकारों से पूछा है कि इस समस्या से निपटने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और मौजूदा कानूनों को और अधिक प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है।

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