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संपादकीय: चेतना की मशाल और राष्ट्र का भविष्य — युवाओं, शासन व प्रशासन के नाम एक खुला पत्र

न भूमिका, न पक्षपात; केवल सत्य और राष्ट्रहित। आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ भीड़ का हिस्सा बनना आसान है, लेकिन विचारशील नागरिक बनना चुनौतीपूर्ण। ‘अग्रसर भारत’ आज समाज के हर वर्ग—चाहे वह श्रमिक हो, कर्मचारी हो या जोश से भरा युवा—उनसे संवाद कर रहा है। यह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर प्रहार नहीं, बल्कि एक कड़वे सच का दर्पण है।

1. युवाओं को संदेश: आप सीढ़ी हैं या सारथी?

​अक्सर देखा जाता है कि जब भी कोई आंदोलन या विरोध होता है, अग्रिम पंक्ति में देश का युवा खड़ा होता है। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या आपका जोश आपके भविष्य की कीमत पर इस्तेमाल तो नहीं हो रहा?

​अनेक बार जनप्रतिनिधि अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए युवाओं की भीड़ का उपयोग ‘सीढ़ी’ के तौर पर करते हैं। आवेश में आकर किया गया एक गलत कदम या एक कानूनी मुकदमा उस होनहार युवा का करियर और उसके माता-पिता के सपनों को उम्र भर के लिए अंधकार में धकेल सकता है।

युवाओं को समझना होगा: राजनीति की बिसात पर मोहरा न बनें। विरोध का स्वर बुलंद करना आपका अधिकार है, लेकिन यह विवेकपूर्ण होना चाहिए। अपनी ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण और आत्मनिर्भरता में लगाएं, न कि किसी की ‘सात पुश्तों’ को संवारने का साधन बनने में।

 

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2. शासन और प्रशासन को संदेश: कुर्सी स्थाई नहीं, कर्म स्थाई हैं

​सरकारें आती-जाती रहती हैं, नीतियां बदलती रहती हैं, लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी ‘स्थाई’ है। अधिकारियों को यह याद रखना होगा कि नियम और कानून केवल किताबों के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए होते हैं।

​प्रशासन को सही और गलत के बीच का महीन अंतर पहचानना चाहिए। हर अधिकारी गलत नहीं होता, लेकिन जब तंत्र मूकदर्शक बनकर गलत का साथ देता है, तो आने वाली पीढ़ियों का विश्वास टूट जाता है।

  • अधिकारियों के लिए चिंतन: आज आप जिस कुर्सी पर हैं, वह सेवा का माध्यम है। याद रहे, समय का चक्र घूमता है। आज के निर्णय कल आपकी आने वाली पीढ़ी के लिए एक विरासत बनेंगे। पतन हमेशा बुराई का होता है, इसलिए सत्ता के दबाव से ऊपर उठकर सत्य का साथ देना ही असली प्रशासनिक धर्म है।
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3. ‘अग्रसर भारत’ की सोच: सही और गलत की परख

​हमारा मानना है कि न तो हर शासन (सरकार) गलत होता है और न ही हर प्रशासन। व्यवस्था को चलाने वाले व्यक्ति महत्वपूर्ण हैं। एक सजग समाज वही है जिसमें सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस हो।

  • समाज के लिए: भीड़ का हिस्सा बनने से पहले ‘सत्य’ की पड़ताल करें।
  • नेताओं के लिए: जनता को केवल ‘जनाधार’ न समझें, उनकी उम्मीदों और भविष्य के प्रति जवाबदेह बनें।
  • राष्ट्र के लिए: जब तक समाज का हर वर्ग—जाति, धर्म और समुदाय से ऊपर उठकर—देश हित को सर्वोपरि नहीं रखेगा, तब तक वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।
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निष्कर्ष: एक नए उदय की ओर

​यह लेख एक आह्वान है उस चेतना के लिए, जो सोई हुई है। ‘अग्रसर भारत’ की यह सोच है कि देश का विकास केवल भव्य इमारतों से नहीं, बल्कि चरित्रवान युवाओं और निष्पक्ष प्रशासन से होता है। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहाँ अनुशासन और आत्म-चिन्तन हमारा मार्गदर्शक हो।

याद रखें, जब युवा सोच-समझकर कदम बढ़ाएगा, तभी यह राष्ट्र सही मायनों में “अग्रसर” होगा।

— संपादकीय, अग्रसर भारत

(सत्य के साथ, प्रगति की ओर)

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