
तिरुवनंतपुरम। युवाओं के रोजगार, शिक्षा और अधिकारों की बात करने वाली कांग्रेस के सामने केरल से एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। राज्य में लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर (LPST) भर्ती की रैंक लिस्ट में शामिल अभ्यर्थी पिछले 115 दिनों से नियुक्ति की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। हालात यहां तक पहुंच गए कि प्रदर्शन के दौरान एक महिला अभ्यर्थी ने अपना सिर मुंडवा लिया और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। इसके बावजूद कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर मुखर राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
तिरुवनंतपुरम में राज्य सचिवालय के बाहर चल रहे इस आंदोलन में शामिल अभ्यर्थियों का आरोप है कि केरल लोक सेवा आयोग (PSC) की मई 2025 में जारी रैंक लिस्ट में नाम होने के बावजूद उन्हें नियुक्तियां नहीं मिल रही हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि नई भर्ती प्रक्रिया शुरू करने से पहले मौजूदा सूची के आधार पर रिक्त पदों को भरा जाए।
115 दिन से सड़क पर युवा, नियुक्ति के इंतजार में अभ्यर्थी
प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के पद खाली होने के बावजूद मौजूदा रैंक लिस्ट से पर्याप्त नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं। उनका आंदोलन अब केवल नौकरी की मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और सरकार से लिखित आश्वासन की मांग भी इसका प्रमुख हिस्सा बन गई है।
हालांकि, रैंक लिस्ट में नाम आने का अर्थ प्रत्येक उम्मीदवार की नियुक्ति सुनिश्चित होना नहीं है। नियुक्तियां उपलब्ध रिक्त पदों और भर्ती नियमों के आधार पर होती हैं। इसके बावजूद अभ्यर्थियों की मांग है कि मौजूदा सूची के तहत उपलब्ध अवसरों का पूरा उपयोग किया जाए।
महिला अभ्यर्थी ने मुंडवाया सिर, अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू
आंदोलन को उस समय नई दिशा मिली जब ऑल केरल लोअर प्राइमरी स्कूल टीचर रैंक होल्डर्स एसोसिएशन की सचिव वलारमथी ने नियुक्तियों में देरी के विरोध में अपना सिर मुंडवा लिया। उन्होंने 27 अक्टूबर को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी शुरू कर दी।
वलारमथी का आरोप है कि सरकार की ओर से मांगों पर भरोसा तो दिया गया, लेकिन लिखित आदेश जारी नहीं किया गया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को बारिश से बचाने के लिए टेंट और शेड लगाने की अनुमति नहीं दिए जाने का आरोप भी लगाया है।
अभ्यर्थियों की चार प्रमुख मांगें
आंदोलनकारी अभ्यर्थियों ने सरकार के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं।
- शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात 1:30 से घटाकर 1:25 किया जाए, जिससे शिक्षकों की आवश्यकता और नियुक्ति के अवसर बढ़ें।
- हेड टीचर और प्रधानाध्यापकों के रिक्त पद PSC के माध्यम से भरे जाएं।
- मौजूदा रैंक लिस्ट की वैधता अवधि बढ़ाई जाए।
- वर्तमान रैंक लिस्ट से नियुक्तियां पूरी होने तक नई भर्ती का नोटिफिकेशन जारी न किया जाए।
सरकार के आश्वासन के बावजूद आंदोलन जारी
30 सितंबर को सरकार और प्रदर्शनकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच बैठक हुई थी। इसमें 150 से अधिक विद्यार्थियों वाले सरकारी स्कूलों के लोअर प्राइमरी सेक्शन में प्रधानाध्यापक के पदों को PSC के माध्यम से भरने की बात कही गई थी।
इसके अलावा रैंक लिस्ट की वैधता बढ़ाने के अनुरोध पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया गया था। लेकिन संगठन का कहना है कि जब तक मांगों पर लिखित आदेश जारी नहीं होता, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा।
इससे पहले अगस्त में भी वलारमथी ने 13 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। सामान्य शिक्षा मंत्री एन. शम्सुद्दीन से बातचीत के बाद उन्होंने भूख हड़ताल समाप्त की थी। उस समय सरकार ने मांगों पर विचार करने के लिए 45 दिनों का समय मांगा था।
कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल, क्या युवाओं का रोजगार राजनीतिक मुद्दा नहीं?
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस की राजनीतिक भूमिका को लेकर बहस छेड़ दी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बेरोजगारी और युवाओं के रोजगार को लेकर केंद्र सरकार को घेरने वाली कांग्रेस से सवाल पूछा जा रहा है कि केरल में शिक्षक भर्ती के लिए 115 दिनों से संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों के मुद्दे पर उसकी आवाज उतनी मुखर क्यों नहीं है?
जब युवा नियुक्ति पत्र की मांग को लेकर सड़क पर हों, महिला अभ्यर्थी को विरोध में अपना सिर मुंडवाना पड़े और भूख हड़ताल की नौबत आ जाए, तब राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी सवालों के घेरे में आती है।
कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर राजनीतिक दलों का रुख केवल केंद्र की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। राज्यों में भी युवाओं की समस्याओं को उतनी ही गंभीरता से उठाया जाना चाहिए।
अब कांग्रेस के रुख पर भी रहेगी नजर
केरल का यह आंदोलन भर्ती प्रक्रिया, सरकारी जवाबदेही और युवाओं के भविष्य से जुड़े कई अहम सवाल खड़े कर रहा है। अभ्यर्थियों को अब तक लिखित आश्वासन और नियुक्तियों को लेकर ठोस निर्णय का इंतजार है।
115 दिनों के आंदोलन के बाद भी समाधान न निकलना निश्चित रूप से चिंता का विषय है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार अभ्यर्थियों की मांगों पर क्या कदम उठाती है और कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़कर युवाओं के समर्थन में कब सामने आते हैं।



