नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026’ पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की बेंच ने इन नियमों को पहली नज़र में अस्पष्ट और दुरुपयोग के योग्य बताते हुए केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब तलब किया है।
2012 के नियम ही रहेंगे प्रभावी
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब उच्च शिक्षण संस्थानों में 23 जनवरी को जारी नए नियमों के बजाय साल 2012 के पुराने नियम ही लागू होंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक इस मामले की अगली सुनवाई (19 मार्च) नहीं हो जाती, तब तक नई नियमावली प्रभावी नहीं होगी।
कोर्ट की तीखी टिप्पणी: “दुरुपयोग का है खतरा”
सुनवाई के दौरान जस्टिस ज्योमाल्या बागची ने नियमों की शब्दावली पर कड़े सवाल उठाए। बेंच ने कहा:
- रेगुलेशन में इस्तेमाल किए गए शब्द स्पष्ट नहीं हैं, जिससे इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है।
- अदालत समाज में एक निष्पक्ष और समावेशी माहौल चाहती है, लेकिन नियमों की प्रासंगिकता संदिग्ध है।
- बेंच ने सवाल किया कि जब पहले से ही 3 ‘E’ (Equity, Efficiency, Equality) मौजूद हैं, तो फिर नए 2 ‘C’ की आवश्यकता क्यों पड़ी?
नियमों को बताया गया असंवैधानिक
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन ने UGC एक्ट की धारा 3(C) को असंवैधानिक करार देते हुए चुनौती दी। उनकी दलील थी कि:
- ये नियम भेदभावपूर्ण और संविधान के साथ-साथ UGC एक्ट, 1956 के भी खिलाफ हैं।
- धारा 3(C) केवल इस धारणा पर आधारित है कि सामान्य श्रेणी के छात्र भेदभाव करते हैं, जो कि गलत है।
- ये नियम समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं और कुछ विशिष्ट समूहों को प्रक्रिया से बाहर कर सकते हैं।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में अदालत केवल इन प्रावधानों की कानूनी वैधता और संवैधानिकता की बारीकी से जांच कर रही है।
अगली सुनवाई: 19 मार्च, 2026


