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हल्द्वानी | 23 अक्टूबर 2026

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज होने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी के भीतर प्रत्याशियों के चयन और स्थानीय नेताओं की भूमिका को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसी बीच पार्टी की ऐसी रणनीति सामने आई है, जिसमें अपने विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय नेताओं और लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने पर जोर बताया जा रहा है। यदि इस रणनीति को अमल में लाया जाता है, तो दूसरे क्षेत्रों से लाकर टिकट देने यानी ‘पैराशूट प्रत्याशी’ उतारने की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं के राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

अपनी सीट पर मजबूत पकड़ रखने वालों पर रहेगा जोर

चुनावी तैयारियों के बीच भाजपा के लिए प्रत्याशियों का चयन महत्वपूर्ण चुनौती रहने वाला है। स्थानीय स्तर पर सक्रियता, कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल और क्षेत्र में जनसंपर्क जैसे पहलू टिकट के दावेदारों के लिए अहम माने जा रहे हैं।

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पार्टी के भीतर यह विचार महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि जो नेता लंबे समय से अपने क्षेत्र में जनता के बीच सक्रिय हैं, उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर मिलने से संगठन को मजबूती मिल सकती है। हालांकि, किसी भी सीट पर उम्मीदवार उतारने का अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व ही करेगा।

पैराशूट प्रत्याशियों की राह आसान नहीं?

राजनीति में ‘पैराशूट प्रत्याशी’ उन नेताओं को कहा जाता है, जिन्हें किसी ऐसे विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा जाता है जहां उनकी स्थानीय राजनीतिक सक्रियता सीमित रही हो या वे दूसरे क्षेत्र से आए हों। ऐसे उम्मीदवारों को लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं में नाराजगी की आशंका भी रहती है।

भाजपा की कथित स्थानीय-केंद्रित रणनीति से उन दावेदारों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जो अपनी मौजूदा राजनीतिक जमीन से अलग किसी दूसरी सीट पर टिकट की उम्मीद लगाए हुए हैं। हालांकि, फिलहाल इसे सभी सीटों पर लागू होने वाले किसी आधिकारिक नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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जिलाध्यक्ष प्रताप बिष्ट ने क्या कहा?

भाजपा जिलाध्यक्ष प्रताप बिष्ट ने प्रत्याशियों के चयन को पार्टी हाईकमान का अधिकार बताया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में पार्टी का कौन-सा नेता किस विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेगा, इसका फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा।

प्रताप बिष्ट के मुताबिक, किसी दावेदार को उसकी अपनी विधानसभा सीट से टिकट मिलता है तो यह अच्छी बात है। उन्होंने यह भी कहा कि जब किसी दूसरे विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी लाया जाता है, तो कई बार स्थानीय कार्यकर्ता निराश हो जाते हैं।

उनके इस बयान से स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को ध्यान में रखने का महत्व सामने आता है। हालांकि, उन्होंने किसी भी प्रत्याशी के टिकट को लेकर अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं की है।

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टिकट की दौड़ में स्थानीय समीकरण होंगे अहम

आगामी चुनाव में भाजपा के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने, स्थानीय दावेदारों के बीच संतुलन बनाने और जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखने की चुनौती होगी। टिकट वितरण के दौरान पार्टी को स्थानीय कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं और व्यापक चुनावी समीकरणों के बीच तालमेल बैठाना पड़ सकता है।

फिलहाल प्रत्याशियों की आधिकारिक सूची सामने नहीं आई है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि टिकट वितरण के समय स्थानीय नेतृत्व को कितनी प्राथमिकता मिलती है और किन सीटों पर पार्टी नए चेहरों या दूसरे क्षेत्रों से आने वाले नेताओं पर भरोसा जताती है।

अब नजर भाजपा के टिकट चयन पर है। स्थानीय दावेदारों को प्राथमिकता देने की चर्चा यदि फैसलों में भी दिखाई देती है, तो इसका असर पार्टी के भीतर टिकट की दौड़ और विधानसभा चुनाव के सियासी समीकरणों पर पड़ सकता है।

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By पंकज शर्मा

निष्पक्ष, सटीक और त्वरित समाचार आप तक पहुँचाने के संकल्प के साथ 'अग्रसर भारत' की नींव रखी गई है। डिजिटल मीडिया पत्रकारिता (DJNM) में प्रशिक्षित संपादक पंकज शर्मा के नेतृत्व में हमारा लक्ष्य हर खबर को उसकी सच्चाई और जिम्मेदारी के साथ आपके सामने लाना है।