देहरादून / विशेष संवाददाता
उत्तराखंड सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग द्वारा प्रदेश के वेब पोर्टल्स और डिजिटल समाचार माध्यमों के इम्पैनलमेंट एवं विज्ञापन दरों के निर्धारण हेतु जारी वित्तीय निविदा इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। निविदा के नियमों में जहां न्यूनतम दर (L1) को ‘आधार दर’ (Base Rate) मानने का प्रावधान है, वहीं निविदा की शर्त संख्या 8 और 9 महानिदेशक को यह विशेषाधिकार देती हैं कि वे किसी भी अव्यवहारिक अथवा असामान्य दर को निरस्त कर सकते हैं। डिजिटल पत्रकारिता से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रशासनिक प्रावधान सही मायनों में निष्पक्ष और छोटे वेब पोर्टल्स के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एक मजबूत ‘सुरक्षा कवच’ साबित हो सकता है।
अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा और ‘प्रिडेटरी बिडिंग’ पर रोक जरूरी
टेंडर प्रक्रिया में अक्सर यह देखा गया है कि कुछ गैर-गंभीर अथवा साधन-संपन्न संस्थाएं केवल काम हासिल करने की होड़ में ₹1000 या ₹1200 प्रति माह जैसी नाममात्र की दरें प्रस्तुत कर देती हैं। मौजूदा नियमावली के तहत सबसे कम दर ही सभी पोर्टल्स के लिए अनिवार्य बेस रेट बन जाती है। ऐसे में यदि यह स्थिति बनती है, तो निष्पक्ष और ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले स्थानीय पत्रकारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। शर्त संख्या 9 विभाग को यह स्पष्ट अधिकार देती है कि यदि दरें अव्यवहारिक प्रतीत हों, तो उन्हें तत्काल खारिज किया जाए।
सर्वर खर्च, मेंटेनेंस और 24×7 डिस्प्ले की अनिवार्यता
सरकारी विज्ञापन की शर्तों के अनुसार पोर्टल्स पर डेस्कटॉप और मोबाइल दोनों प्रारूपों में 24 घंटे विज्ञापन प्रदर्शित करना अनिवार्य है, जिसमें डिजाइनिंग और तकनीकी रख-रखाव का व्यय भी शामिल है। आज के डिजिटल युग में उच्च गुणवत्ता वाले सर्वर, तकनीकी सुरक्षा, डोमेन, डेटाबेस और फील्ड रिपोर्टिंग का मासिक खर्च हजारों रुपये बैठता है। ऐसे में यदि दरें तार्किक और सम्मानजनक नहीं होंगी, तो छोटे एवं मध्यम समाचार पोर्टल्स के लिए अपना संचालन जारी रखना असंभव हो जाएगा।
विभाग की साख और गुणवत्तापूर्ण प्रचार का संतुलन
अत्यंत कम दरों पर सेवा लेने से स्वयं विभाग के प्रचार अभियानों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। यदि कोई पोर्टल नुकसान झेलकर नाममात्र दर पर अनुबंध कर भी ले, तो लंबी अवधि तक निर्बाध सेवा सुनिश्चित करना कठिन होता है। इसलिए एक व्यावहारिक और न्यूनतम सम्मानजनक दर तय करना विभाग के प्रशासनिक हित और सरकार के प्रचार तंत्र—दोनों के लिए आवश्यक है।
डिजिटल मीडिया जगत से जुड़े संपादकों और पत्रकारों की नजरें अब सूचना महानिदेशक के निर्णय पर टिकी हैं। यदि महानिदेशक अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए अवास्तविक रूप से कम दरों को निरस्त कर एक न्यायसंगत और व्यावहारिक न्यूनतम दर निर्धारित करते हैं, तो इससे न केवल स्थानीय पत्रकारों का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि राज्य में स्वतंत्र व जिम्मेदार डिजिटल पत्रकारिता को भी नया संबल मिलेगा।
- 1: सूचना विभाग की वित्तीय निविदा में डिजिटल मीडिया के लिए ‘सेफ्टी क्लॉज’: अव्यवहारिक और कौड़ियों के भाव तय होने वाली दरों पर महानिदेशक लगा सकते हैं रोक
- 2: वेब पोर्टल्स की आर्थिक सुरक्षा: विज्ञापन टेंडर में ₹1200 जैसी असामान्य दरों को निरस्त करने का विशेषाधिकार, पत्रकार हित में ठोस निर्णय की दरकार
- 3: डिजिटल पत्रकारों के अस्तित्व पर मंडराता ‘रेट वॉर’ का खतरा; सूचना महानिदेशक के विशेषाधिकार पर टिकी सम्मानजनक विज्ञापन दरों की उम्मीद


