
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने टिहरी गढ़वाल में अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की हत्या के मामले में मृत्युदंड की सजा पाए संजय सिंह को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने उसकी फांसी की सजा निरस्त करते हुए राज्य सरकार को मानसिक उपचार कराने और स्वास्थ्य में सुधार होने पर रिहाई की प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए हैं। मामले में आरोपी की मानसिक स्थिति और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को महत्वपूर्ण आधार माना गया।
इस फैसले ने एक बार फिर आपराधिक मामलों में मानसिक स्वास्थ्य, आरोपी की जिम्मेदारी और सजा के निर्धारण से जुड़े कानूनी पहलुओं को चर्चा में ला दिया है। अदालत के समक्ष यह सवाल महत्वपूर्ण रहा कि घटना के समय आरोपी की मानसिक स्थिति क्या थी और क्या वह अपने कृत्य की प्रकृति तथा उसके परिणामों को समझने में सक्षम था।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट बनी अहम आधार
मामले की सुनवाई के दौरान संजय सिंह की ओर से न्यायमित्र नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद वशिष्ठ ने अदालत के समक्ष उसकी मानसिक स्थिति से संबंधित दलीलें रखीं। बचाव पक्ष के अनुसार, मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में आरोपी के मानसिक बीमारी से पीड़ित होने की बात सामने आई थी।
दलील दी गई कि घटना के समय उसकी मानसिक स्थिति ऐसी थी कि वह अपने कृत्य के परिणामों को समझने में सक्षम नहीं था। साथ ही, चिकित्सा के माध्यम से उसके स्वास्थ्य में सुधार की संभावना भी व्यक्त की गई थी।
न्यायमित्र ने तर्क दिया कि निचली अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाते समय मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े इन पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। हाईकोर्ट में इन तथ्यों और उपलब्ध चिकित्सकीय रिकॉर्ड पर विचार किया गया।
2014 में तीन हत्याओं से दहल उठा था टिहरी का गुमाल गांव
यह मामला टिहरी गढ़वाल के गुमाल गांव में 13 दिसंबर 2014 को हुई तीन हत्याओं से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संजय सिंह पर अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की हत्या करने का आरोप था। घटना के बाद उसके पिता राम सिंह पवार ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
मामले की सुनवाई के बाद अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रमा पांडेय की अदालत ने अगस्त 2021 में संजय सिंह को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने क्यों बदला मृत्युदंड का फैसला?
अपील पर विचार करते समय आरोपी की मानसिक स्थिति और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मुद्दे बने। अदालत के समक्ष यह पहलू रखा गया कि घटना के समय उसकी मानसिक बीमारी का उसके व्यवहार और अपने कृत्य को समझने की क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ा था।
मामले में चिकित्सकीय रिकॉर्ड के आधार पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े तथ्यों पर विचार किया गया। इसी क्रम में हाईकोर्ट ने मृत्युदंड की सजा निरस्त करने का फैसला सुनाया।
मानसिक उपचार के बाद रिहाई के निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को संजय सिंह का उचित मानसिक उपचार कराने और उसके ठीक होने पर रिहाई की प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए हैं। इस तरह अदालत के आदेश में आरोपी के मानसिक स्वास्थ्य और उपचार को विशेष महत्व दिया गया है।
हालांकि, आदेश के सटीक क्रियान्वयन, उपचार की स्थिति और रिहाई की प्रक्रिया से संबंधित विस्तृत शर्तों की पुष्टि मूल न्यायिक आदेश से की जानी चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य और न्यायिक प्रक्रिया पर अहम सवाल
यह मामला दर्शाता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में भी आरोपी की मानसिक स्थिति से जुड़े चिकित्सकीय साक्ष्य न्यायिक विचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। मृत्युदंड जैसे कठोर दंड के मामलों में घटना के समय आरोपी की मानसिक क्षमता और उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड पर विचार करना विशेष महत्व रखता है।
हाईकोर्ट का यह फैसला अब मानसिक स्वास्थ्य और आपराधिक न्याय व्यवस्था के संदर्भ में चर्चा का विषय बन सकता है।



